भिक्षु चरमोत्सव के विविध आयोजन

संस्थाएं

भिक्षु चरमोत्सव के विविध आयोजन

चंडीगढ़
आचार्य भिक्षु श्रमण परंपरा के महान संवाहक थे। आचार्य भिक्षु जब तक जिए, ज्योति बनकर जिए। उनके जीवन का हर पृष्ठ पुरुषार्थ की गौरवमयी गाथाओं से भरा पड़ा है। आचार्य भिक्षु सत्य के लिए प्राण न्यौछावर करने के लिए तत्पर थे। वे महान आत्मबली थे। जीवन में शुद्ध साधुता को प्रतिष्ठित करना चाहते थे। ये शब्द मनीषी संत मुनि विनय कुमार जी ‘आलोक’ ने अणुव्रत भवन, तुलसी सभागार में आचार्य भिक्षु के 220वें चरम कल्याणक दिवस पर व्यक्त किए। मुनि विनय कुमार जी ‘आलोक’ ने कहा कि आचार्य भिक्षु ने अपने मौलिक चिंतन के आधार पर नए मूल्यों की स्थापना की। हिंसा व दान-दया संबंधी उनकी व्याख्या सर्वथा वैज्ञानिक कही जा सकती है। आचार्य भिक्षु की अहिंसा सार्वभौतिक क्षमता पर आधारित थी। मुनि विनय कुमार जी ने आगे कहा कि आचार्य भिक्षु ने जैन समाज में प्रचलित मान्यता के समक्ष नया चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि रक्त से सना वस्त्र कभी रक्त से शुद्ध नहीं होता। वैसे ही हिंसा प्रधान प्रवृत्ति कभी अध्यात्म के पावन लक्ष्य तक नहीं पहुँचा सकती। आचार्य भिक्षु के साहित्य को पढ़कर आधुनिक विद्वान् उन्हें हिगल और काण्ट की तुला से तोलते हैं।