सहिष्णुता, सेवा और सहयोग की भावना बने प्रवर्धमान: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

सहिष्णुता, सेवा और सहयोग की भावना बने प्रवर्धमान: आचार्यश्री महाश्रमण

बालोतरा, 11 जनवरी, 2023
वर्धमान महोत्सव एवं बालोतरा प्रवास का अंतिम दिन। विकास पुरुष, तेरापंथ के महानायक आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मंगल पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि वर्धमानता अनेक संदर्भों में हो सकती है। संख्या, उम्र, गुणात्मकता व शरीर-बल आदि की वर्धमानता, वर्धमानता का नकारात्मक पक्ष हैµदुर्गुणों की वर्धमानता न हो जाए।
धर्म और पुण्य दो तत्त्व हैं। आम आदमी इन दोनों को एक ही श्रेणी में मान लेता है। पर सूक्ष्मता में तात्त्विक वर्णन के अनुसार धर्म और पुण्य अलग-अलग होते हैं। धर्म जीव है, पुण्य अजीव है। धर्म अमूर्त है, पुण्य मूर्त है। पुण्य तो बंधने वाले कर्म हैं। उदय में भी आते हैं। धर्म की वर्धमानता तो वांछनीय है, पर पुण्य की वर्धमानता बहुत विरक्त-भाव की दृष्टि से देखें तो वांछनीय नहीं है। साधु-साध्वी को तो पुण्य वर्धमान की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए।
तीर्थंकरों के आठ प्रतिहार्य होते हैं। वो धर्म नहीं है, पुण्य है। तीर्थंकर की साधना धर्म है। अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन आदि चार प्रथम गुण धर्म से जुड़े हैं, ये निश्वद्य हैं। हम वांछा निर्जरा की करें। साधु के दो संवर सम्यक्त्व और व्रत तो होते ही हैं। अप्रमाद संवर की वर्धमानता हो जाए। प्रमाद दो प्रकार का होता हैµप्रमाद आश्रव अनुत्साह रूप है, दूसरा है, अशुभ प्रवृत्ति रूप प्रमाद। साधु के सावद्य योग प्रमाद का त्याग है, प्रमाद आश्रव के नहीं।
आगमों के मनन या ध्यान की गहराई में चले जाएँ तो ऐसी स्थिति में अप्रमाद संवर आ सकता है। अशुभ योग की विरक्तता में पुष्टि आए। छठा गुणस्थान एकम का चांद है तो सातवाँ गुणस्थान पूनम का चाँदµधीरे-धीरे आगे बढ़ें।
वर्धमानता हमारी सातवें गुणस्थान की हो, वो बड़ी चीज है। माता मरुदेवा की तरह सामान्य अवस्था में बैठा आदमी सातवें गुणस्थान या आगे भी बढ़ सकता है। अशुभ योग प्रमाद संवर से दोष लग सकता है। अकषाय संवर तो वर्तमान में नहीं आ सकता पर अकषाय के भाव हमारे में पुष्ट हो जाएँ। कषाय के भाव प्रतनू हों।
हम सम्यक् दिशा में आगे बढ़ें। शक्ति में वर्धमानता एवं सहिष्णुता भी रहे। क्षमा का भी भाव रहे। परावलंबिता से जितना बच सकें, बचने का प्रयास करें। आपस में सामंजस्य भी रहे। हम साताकारी बने रहें। परस्पर का व्यवहार अच्छा रहे। चित्त समाधि रखें और देने की भावना रखें। सहयोग की भावना रहे। आध्यात्मिक सहयोग देना भी एक सेवा है।
व्याख्यान-उपदेश देना भी सेवा है। मुनि दिनेश कुमार जी भी कितनी सेवा करते हैं, संयोजन भी करते हैं। कई संत आगे-आगे चलते हैं। सतियाँ भी समय पर सारे काम समुच्चय की गोचरी व अन्य कार्य करते हैं। खुद की अनुकूलता को गौण करते हैं। अनेक सेवा के उपक्रम हैं। बड़ों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। न्यारा वाले अपने ढंग से करते हैं। गुरुकुल वाले भी अलग-अलग ड्यूटी में लगे रहते हैं। कितना महान कार्य करते हैं। हर कार्य में निष्ठा-जागरूकता रहती है, वो विशेष है।
साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभा जी एवं साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा जी का भी बहुत सहयोग रहता है। जिंदगी में जो सेवा का मौका मिलता है, वो अपनी पूँजी होती है। विहार का रास्ता तय करना भी विशेष सेवा का काम है। ख्यात लिखना, नवदीक्षितों को तैयार करना भी बड़ी सेवा है। सेवा से निर्जरा का कार्य होता है। शारीरिक सेवा के साथ बौद्धिक सेवा भी करते हैं। बौद्धिक सेवा करना भी महत्त्वपूर्ण है। लीडर बनना बड़ी बात होती है। लीडिंग व मैनेजमेंट पाॅवर भी अच्छा रहे। क्षयोपशम सबमें समान नहीं होता है।
संयोजन करते-करते विकास हो जाता है, साथ में विनय भाव रहते हैं। आगम कार्य में भी दिमाग चाहिए। जिसे हर कोई नहीं कर सकता है केवल प्रज्ञावान ही कर सकता है। आध्यात्मिक पर्यवेक्षण का भी कार्य करते हैं। परस्पर एक-दूसरे का सहयोग करने से संगठन का काम चलता है, वहाँ अनेक प्रकार के व्यक्तित्व चाहिए। सबका अपना कर्तव्य है। सेवा भावना से कार्य करने से आनंद की अनुभूति होती है। जहाँ जो उचित हो सेवा देते रहें। वर्धमानता में हमारा बढ़ना होता रहे। आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने बहुत समय अध्यापन, आगम, प्रेक्षाध्यान में व समाधान देने में लगाया है। उनसे भी हम प्रेरणा लें।
चारित्रात्माएँ बड़ी अध्यात्म रत्न की माला हैं। श्रावक-श्राविकाएँ छोटी रत्नों की मालाएँ हैं। बड़ी माला का महत्त्व ज्यादा है। अनेक रूपों में सेवा के कार्य हैं, हम सेवा में लगे रहें। लोच करना भी सेवा है। सौहार्द भाव से काम करना सेवा ही है। हम सेवा के क्षेत्र में वर्धमानता रहे।
बालोतरा अच्छा क्षेत्र है। तपस्या भी अच्छी हो रही है। लोगों में अनेक समाजों में आपसी सौहार्द है। आज ये वर्धमान महोत्सव संपन्न होने को है। सबमें आध्यात्मिक चित्त समाधि रहे, अच्छे कार्य करते रहें।
मुनि पुनीत कुमार जी ने अपनी जन्मभूमि की ओर से पूज्यप्रवर का स्वागत किया। पूज्यप्रवर के स्वागत में मुमुक्षुवृंद ने गीत की प्रस्तुति दी। ज्ञानशाला ज्ञानार्थियों ने महाश्रमण अष्टकम्, कव्वाली व बारहव्रतों पर प्रस्तुति दी। मुमुक्षु साधना बांठया, सैफाली चोपड़ा, ज्ञानशाला मुख्य प्रशिक्षिका उर्मिला, तेयुप, महिला मंडल व कन्या मंडल समूह गीत की प्रस्तुति दी। कन्या मंडल संयोजिका साक्षी, महिला मंडल समूह गीत का संगान किया। राजेश खीमेसरा, शैली गोगड़, सिद्धार्थ ने अपनी भावना अभिव्यक्त की।
कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।