असीम प्रज्ञा के धनी महापुरुश थे आचार्य महाप्रज्ञ

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असीम प्रज्ञा के धनी महापुरुश थे आचार्य महाप्रज्ञ

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तेरापंथ के दसवें अनुशास्ता आचार्य महाप्रज्ञ का 104वां जन्मदिवस भिक्षु साधना केंद्र में मनाया गया। इस अवसर पर ‘शासनश्री’ मुनि विजयकुमार ने उपस्थित श्रावक- श्राविकाओं से कहा-‘आचार्य महाप्रज्ञ असीम प्रज्ञा के धनी महापुरुष थे। ऐसा कोई भी विषय नहीं था, जहां उन्होंने अपनी प्रज्ञा का परचम न फहराया हो। उन्होंने अपने बहुआयामी साहित्य में कई अज्ञात रहस्यों का उद्घाटन किया। उनकी हंसमनीषा विद्वानों, दार्शनिकों व साहित्यकारों के लिए भी अगम्य थी। गुरु की शुभ दृष्टि को ही वे अपने भाग्य की सृष्टि मानते थे। दृष्टि के प्रतिकूल अपने प्रलम्ब जीवन में उन्होंने एक भी काम नहीं किया।’
अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण विक्रम संवत् 2035 कार्तिक शुक्ला 13 को आचार्य तुलसी ने गंगाशहर में उनको ‘महाप्रज्ञ’ उपाधि से अलंकृत किया और कहा- मुनि नथमल की अपूर्व सेवाओं के प्रति समूचा धर्मसंघ कृतज्ञता ज्ञापित करता है। यह अलंकरण ही गुरुवर द्वारा नाम के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। शासनश्री ने गुरुवर के प्रति श्रद्धागीत प्रस्तुत किया। मुनि आत्मानन्द ने गुरुवर की भक्ति में अपना गीत प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का प्रारम्भ तेरापंथ महिला मण्डल की बहिनों के मंगल गीत से हुआ। तेरापंथी सभा प्रवक्ता प्रदीप सुराणा, तेरापंथी सभा के मंत्री चमन दूधोड़िया, अणुव्रत समिति अध्यक्ष विनोद नाहटा, सूरजमल नाहटा, शोभा डोसी, सरोज भंसाली, हेमलता दूधोड़िया, सज्जन दूधोड़िया, सुमन भूतोड़िया, राजू नाहटा, सुमन बैद ने अपने गीत और भाषण से अपने आराध्य की अभिवन्दना की। सपना बैद ने संयोजन किया।