मृदुता और मार्दव से जीतें अहंकार को : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

मृदुता और मार्दव से जीतें अहंकार को : आचार्यश्री महाश्रमण

घाटकोपर, 5 जनवरी, 2024
नशामुक्ति के प्रेरणा प्रदायक आचार्यश्री महाश्रमण जी ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि आदमी के भीतर अनेक वृत्तियों में से एक वृत्ति अहंकार की भी हो सकती है। आदमी अधिकार पाने का प्रयास कर सकता है। दूसरों को अपने अधीन करना चाहता है, उससे पूछें कि क्या तुम किसी के अधीन रह सकते हो? दूसरों पर अनुशासन करने की आकांक्षा करने वाला व्यक्ति स्वयं भी दूसरों के अनुशासन में रह सके, ऐसी भावना का उसमें विकास होना चाहिए। घमंड-अहंकार, मान अठारह पापों में से एक है। मान को मृदुता, मार्दव के द्वारा जीतना चाहिए। अहंकार अनेक चीजों का हो सकता है, पर उन चीजों के उपयोग के बारे में चिंतन करें। घमंड न करें। हम आत्मा के स्वरूप का चिंतन करें। स्वयं के मुख से स्वयं की प्रशंसा न करें। ज्ञान है, फिर भी मौन रखो, दिखावा मत करो। ऐश्वर्य-सत्ता भी सेवा के लिए मिली है, उसका अहंकार न हो। सेवा से अधिकार उपहार बन सकता है।
हमें जीवन में जो उपलब्धियाँ प्राप्त हुई हैं, उसका अच्छा उपयोग करना चाहिए। उन्हें अहंकार का कारण न बनाएँ। दूसरों पर अनुशासन करने से पहले स्वयं पर अनुशासन करो। ‘निज पर शासन, फिर अनुशासन’। अहंकार रहित रहना भी एक योग्यता है। ज्ञान और ज्ञान देने वाले के प्रति विनय का भाव हो। अविनीत को विपत्ति और विनीत को संपत्ति प्राप्त होती है। लघुता से प्रभुता मिलती है। बड़ा बनने के लिए लघु बनना चाहिए। ज्ञान प्राप्त कर दूसरों को बाँटने का प्रयास करें। जो हमें प्राप्त है, उसका धार्मिक-आध्यात्मिक उपयोग हो। साधु हो या गृहस्थ घमंड न करें। हमारे धर्मसंघ में विनय की एक परंपरा रही है। हम घमंड-अहंकार से बचकर अच्छी विशेषताओं को प्राप्त करने का प्रयास करें। पूज्यप्रवर की अभिवंदना में कच्छ समाज से जुड़ी महिलाओं ने गीत का संगान किया। निमिका सियाल ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।