अमृतोत्सव है तुम्हारा

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साध्वी शीलयशा

अमृतोत्सव है तुम्हारा

धरती अम्बर जयकारा, अमृतोत्सव है तुम्हारा,
घर-घर आनन्द बहारां, पुलकित है नयन सितारा,
ये महाश्रमण तो दिव्य उजारा है, चमकता ध्रुव तारा है।।
शिशु ने जब अवतार लिया, सबके दिल को भाया,
दुगड़ कुल में खुशिया छाई, भाग्योदय का क्षण आया।
झूमरमलजी मां नेमा ने, देव रूप बालक पाया,
संस्कारों की सौरभ से वैराग्य सुमन खिलाया।।
दो गुरुओं का मस्तक हाथ, बने हमारे शासन नाथ,
देश विदेशों के कोने-कोने में, गूंज रही तेरी आवाज।
धर्मसंघ विकसित करने, रहता श्वास-श्वास में चिन्तन,
साधु सतियों में आगम का शब्द-शब्द से करते सिंचन।।
तेरा आभामंडल, लगता सबको मन भावन,
तुम कल्पवृक्ष चिन्तामणी, आशा पूरक ज्यों सावन।
लिये अष्ट मांगलिक कर में, सजा आरती की थाली,
तिलक लगाए भव्य भाल पर, युग-युग जीयो गणमाली।।
लय : सूरज कब दूर