संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

४५. लोकोत्तमो लोकनाथो, लोकद्वीपोऽभयप्रदः। 
      दृष्टिदो मार्गदः पुंसां, प्राणदो बोधिदो महान्॥
भगवन् ! आप संसार में उत्तम हैं, संसार के एकमात्र नेता हैं, संसार के द्वीप हैं, अभयदाता हैं, महान् हैं तथा मनुष्यों को दृष्टि देने वाले हैं, मार्ग देने वाले हैं, प्राण और बोधि देने वाले हैं।
४६. धर्मवरचातुरन्त-चक्रवर्ती महाप्रभः। 
      शिवोऽचलोऽक्षयोऽनन्तो, धर्मदो धर्मसारथिः॥
प्रभो! आप धर्म-चक्रवर्ती हैं। आप महान् प्रभाकर हैं, शिव हैं, अचल हैं, अक्षय हैं, अनन्त हैं, धर्म का दान करने वाले हैं और धर्म-रथ के सारथि हैं।
४७. जिनश्च जापकश्चासि, तीर्णस्तथासि तारकः।
      बुद्धश्च बोधकश्चासि, मुक्तस्तथासि मोचकः॥
प्रभो! आप आत्म-जेता हैं और दूसरों को विजयी बनाने वाले हैं। आप स्वयं संसार सागर से तर गए हैं और दूसरों को उससे तारने वाले हैं। आप बुद्ध हैं और दूसरों को बोधि देने वाले हैं। आप स्वयं मुक्त हैं और दूसरों को मुक्त करने वाले हैं।
इस संसार में सबसे अलभ्य घटना है-शिष्य होना। किसी ने सत्य कहा है एक चीज ऐसी है जिसके देने वाले बहुत हैं और लेने वाले कम। वह है-उपदेश। सब गुरु बनना चाहते हैं, शिष्य नहीं। शिष्य वह होता है जिसमें सीखने की उत्कट अभिलाषा हो। 'इजिप्त' में कहावत है- 'जब शिष्य तैयार होता है तो गुरु मौजूद हो जाता है। गुरु की उपलब्धि भी सहज-सरल नहीं है। जब शिष्य ही न हो तो गुरु का मिलना कैसे संभव हो ? शिष्य कैसे गुरु की खोज करे ? उसमें यदि इतनी योग्यता हो तो फिर वह गुरु से भी ऊंचा हो जाता है। कहते हैं-गुरु ही शिष्य को खोजते हैं।
वायजीद गुरु के पास वर्षों रहा। गुरु ने अनेक ऐसे अवसर दिए कि श्रद्धा प्रकंपित हो जाए। अनेक शिष्य चले गए किन्तु वायजीद स्थिर रहा। साधना पूरी हो गई। गुरु ने कहा-मेरे संबंध में कुछ पूछना है। वायजीद हंसा और बोला-वह सब नाटक था। मुझे अपने काम की जरूरत थी।
फ्रेकक्रैन ने कहा है-सर्वोत्तम गुरु वह है जो आपको आत्म-परिचय कराने के लिए आपका पथ-दर्शन करे। गुरु बांधना नहीं चाहते, वे चाहते हैं मुक्त करना। जापान के आश्रम में तब कोई शिष्य सीखने आता है तो गुरु उसे मार्ग-दर्शन दे देते और कहते- 'यह चटाई है, आना, इस पर बैठकर अपना काम करना और जिस दिन कार्य पूर्ण हो जाए चटाई को गोल कर चले जाना। मैं समझ लूंगा कि काम हो गया है।' धन्यवाद की भी आकांक्षा नहीं रखते। शिष्य कैसे उस कृतज्ञता को भूल सकता है। गुरु लेन-देन, व्यवसाय की बात नहीं चाहते। किन्तु शिष्य का स्वर मुखरित हुए बिना कैसे रह सकता है?