गुरुवाणी/ केन्द्र
धर्मसंघ की प्रभावना के लिए शारीरिक व बौद्धिक क्षमताओं का करना चाहिए उपयोग : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के महासूर्य, एकादशमाधिशास्ता युग प्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में दीक्षा समारोह जैन विश्व भारती लाडनूं में समायोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारंभ पूज्य प्रवर के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। सर्वप्रथम मुमुक्षु चंदन ने दीक्षार्थी बहनों का परिचय प्रस्तुत किया। मुमुक्षु खुशी सुराणा ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। पारमार्थिक शिक्षण संस्थान की ओर से मोतीलाल जीरावाला ने आज्ञा पत्र का वाचन किया। दीक्षार्थियों के पारिवरिक जनों ने आज्ञा पत्र गुरु चरणों में अर्पित कर अपनी अनुमति प्रदान की।
तत्पश्चात आचार्य प्रवर द्वारा दीक्षार्थियों से संक्षिप्त प्रश्तोत्तर किया गया और अंतिम रूप से पात्रता की जांच की गई। आचार्य प्रवर ने आगम वाणी का उच्चारण कर मुमुक्षु सलोनी नखत को साध्वी दीक्षा और मुमुक्षु खुशी सुराणा को समणी दीक्षा प्रदान की। पूज्य प्रवर ने दीक्षा संस्कार के पश्चात् मुमुक्षु सलोनी नखत का आध्यात्मिक नामकरण ‘साध्वी सुकृत प्रभा’ तथा मुमुक्षु खुशी सुराणा का नामकरण ‘समणी गीतप्रज्ञा’ किया। आज के दीक्षा समारोह की मुख्य विशेषता यह रही कि मुमुक्षु सलोनी नखत की दीक्षा की घोषणा मात्र दो घंटे पूर्व ही हुई थी। दसवां अध्ययन भिक्षु के लक्षणों का बोध देने वाला है। साधु-साधियों और समणियों को यह आगम कंठस्थ रहना चाहिए साथ ही इसका पारायण भी होता रहना चाहिए। यदि रोज पूरा न हो सके तो कम से कम सप्ताह में एक बार इसका पारायण अवश्य ही कर लेना चाहिए। अभी परम पूजनीय आचार्यश्री भिक्षु का 300वां जन्म वर्ष भिक्षु चेतना वर्ष चल रहा है। दशवैकालिक के दसवें अध्ययन में भी भिक्खु-भिक्खु शब्द बार-बार आता है। हमें उस अध्ययन में बताई गई बातों को आत्मसात कर तेजस्वी संन्यास और साधना का जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। दीक्षा प्रदान करने के साथ ही मुमुक्ष द्वय संसारी जीवन छोड़कर संयम जीवन में प्रविष्ट हो गई। दीक्षा संस्कार के अन्तर्गत नवदीक्षितों का केश लुंचन आचार्य प्रवर की आज्ञा से साध्वी प्रमुखा विश्रुत विभाजी द्वारा संपन्न हुआ। तत्पश्चात नवदीक्षित साध्वीश्री को ‘रजोहरण’ प्रदान किया गया। दीक्षा संस्कार के पश्चात् साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज समण श्रेणी तेरापंथ धर्म संघ के विकास में निमित्त बन रही है और संघ में चलने वाली विभिन्न गतिविधियों के प्रचार और प्रसार में सम्मिलित है। विदेशों में समण श्रेणी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में जाकर अध्यापन का कार्य कई वर्षों से संपादित कर रही है। जैन दीक्षा भले ही कठोर दीक्षा हो परन्तु आनन्द की दीक्षा है। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि ‘दसवेआलियं’ हमारे बत्तीस आगमों के अन्तर्गत चार मूल में एक आगम है, जो हमारे साधु-साध्वियों के लिए अत्यंत स्मरणीय और मननीय है। साधु को कैसे बोलना चाहिए, गोचरी कैसे करनी चाहिए और अनाचार क्या है? आदि के निर्देश दसवेआलियं के विभिन्न अध्ययनों से प्राप्त होते हैं। विनय और चार समाधियों के संदर्भ में नवमें अध्ययन का उपयोग है। इसके साथ ही साधु-साध्वियों, समणियों और मुमुक्षुओं में सेवा का भाव रहे। अपनी शारीरिक और बौद्धिक क्षमताओं का उपयोग दूसरों के सहयोग और धर्मसंघ की प्रभावना के लिए करना चाहिए। क्योंकि सक्षमता की सार्थकता तभी है जब उसका अच्छा उपयोग होता रहे। सेवाकेंद्रों के संदर्भ में गुरुदेव ने फरमाया कि छापर का संतसेवा केन्द्र अब जैन विश्व भारती सेवा केंद्र में विलीन हो गया है। गुरुदेव ने उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनिश्री कमलकुमारजी को लाडनूं सेवा केन्द्र के लिए नियुक्त किया। योगक्षेम वर्ष के अन्तर्गत प्रेक्षध्यान और तत्त्वज्ञान के प्रशिक्षण के उपक्रम भी चलेंगे। इस हेतु ‘योगक्षेम वर्ष कैलेंडर’ व ‘मार्गदर्शिका’ इन दो पुस्तिकाओं का विमोचन हुआ। गुरुदेव ने इस संदर्भ में मंगल प्रेरणा प्रदान की।