विनय, श्रुत, तप, आचार से शान्ति  को करें  प्राप्त : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 09 फरवरी, 2026

विनय, श्रुत, तप, आचार से शान्ति को करें प्राप्त : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरांपथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने जैन विश्व भारती, लाडनूं के सुधर्मा सभा में आर्हत् वाड्मय के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि चार समाधियां बताई गई हैं - विनय समाधि, श्रुत समाधि, तप समाधि, और आचार समाधि। ये चार चीजें ऐसी है, जिनके आसेवन से समाधि प्राप्त हो सकती है। चित में निर्मलता और शांति की संप्राप्ति हो सकती है, विकास हो सकता है।
व्यक्ति अंहकार से बचे और विनय भाव रखे तो चित में शांति, समाधि और प्रफुल्लता रह सकती है। व्यक्ति के जीवन में, भाषा में, विचार में और शारीरिक मुद्रा में घमंड नहीं आना चाहिये। घमंड का विचार करना, भाषा में अभिव्यक्त करना और शारीरिक मुद्रा में भी घमंड आना, अंहकार ही होता है। घमंड का संबंध भीतर के भावों से होता है। भीतर में जैसे भाव होते हैं तदनुसार अभिव्यक्ति होती है। हमारे भीतर जैसे भाव होते हैं वे चाहे सामने वाला व्यक्ति न जान सके परंतु गहराई से चेहरे को पढ़ने वाला व्यक्ति यह आकलन कर सकता है कि भीतर में क्या चल रहा है। भीतर के भाव बाहर शरीर के अंगों में भी प्रकट हो सकते हैं। जैसे कोई व्यक्ति भयभीत होता है तो उसके चेहरे की मुद्रा बदल जाती है। कोई व्यक्ति चिंता में, आलस्य में होता है तो उसी के अनुरूप उसके शरीर की स्थिति हो जाती है। इसी प्रकार स्नेह अथवा आक्रोश के भाव चेहरे पर अथवा आंखों से दिखाई दे सकते हैं। बाहर के अंगों में भीतर की मनःस्थिति प्रकट हो जाती है। जो साधु अथवा व्यक्ति अंहकार को दूर रखे और मार्दव भाव का अभ्यास रखे, विनय भाव रखे उसके चित में शांति रह सकती है। अविनय, अंहकार का भाव और उसके अनुरूप ही आचार हो तो व्यक्ति दुःखी बन सकता है। अविनीत को विपत्ति और विनीत को संपत्ति मिलती है अतः विनय समाधि प्राप्ति करने का उपाय हो।
दूसरी समाधि है श्रुत समाधि। हमारी परंपरा में बतीस आगम मान्य है अतः जितना संभव हो सके आगम स्वाध्याय करने का प्रयास करें। चितारणा करें और साथ में अर्थ का भी बोध करें। स्वाध्याय से चित्त में शांति और वैराग्य भाव की परिपृष्टि हो सकती है। स्वाध्याय करने से ज्ञान बढ़ता है और मन स्वाध्याय में लग जाने से मन की एकाग्रता भी बढ़ सकती है। ज्ञान और एकाग्रता से हम संमार्ग में अपने आपको नियोजित कर सकते हैं और उपदेश से दूसरों को भी धर्म के मार्ग में स्थापित कर सकते हैं। अतः श्रुत भी एक समाधि का कारण है।
तीसरी है तप समाधि। तप करने से भी समाधि मिल सकते है। जिनके शारीरिक अनुकूलता हो उन्हें तपस्या करनी चाहिए। सेवा करने से भी समाधि मिल सकती है। चौथी है आचार समाधि। व्यक्ति के आचार में जागरूकता रखने से भी समाधि मिलती है। साधु पांच महाव्रत पांच समिति और तीन गुप्तियों के सम्यक् पालन में जागरूक रहे। इस प्रकार व्यक्ति अपनी समाधि को अपने हाथ में रखने का प्रयास करे तो बहुत बात हो सकती है। इस प्रकार विनय, श्रुत, तप और आचार - इन समाधियों की साधना से चेतना निर्मलता को प्राप्त कर सकती है। साधु-साध्वियों की अभिव्यक्ति के क्रम में साध्वी कल्पलताजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। पूज्य गुरुदेव ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुनि विजयकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी और सहयोगी संतों के साथ गीत का संगान किया। मुनि गौरवकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। पूज्य प्रवर ने सबको मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुमुक्षु बहिनों ने गीत का संगान किया। साध्वी कार्तिकयशाजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी और आचार्य प्रवर ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।