गुरुवाणी/ केन्द्र
संयम, तप, और साधना से भव सागर को पार करने का प्रयास करें :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, शांति दूत आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार प्रातः काल अपनी धवल सेना के साथ गतिमान हुए और लगभग तेरह किमी. का विहार सम्पन्न कर मंगलपुरा में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। इससे पूर्व मार्ग में बहिर्विहार से पधारे मुनि कमलकुमारजी व मुनि जयकुमारजी आदि संतों ने आचार्यश्री के दर्शन किए, वंदन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि हमारे जीवन में दो तत्त्व हैं - आत्मा और शरीर। दोनों की प्रकृति भिन्न-भिन्न है। आत्मा जहां चैतन्य स्वरूप है वहीं शरीर अजीव है, जड़ है। शरीर और आत्मा का मिला हुआ रूप हमारा जीवन होता है। कोरी आत्मा है, तो वहां शरीर, वाणी, मन वाला जीवन नहीं हो सकता। जहां शरीर नहीं है वहां श्वासोच्छ्वास भी नहीं हो सकता। जहां कोरा शरीर है, आत्मा नहीं है वहां भी जीवन नहीं हो सकता। यह सामान्य बात है कि जीवन वहां होता है जहां शरीर और आत्मा दोनों मिश्रित होते हैं। जहां आत्मा शरीर से निकल गई, वह मृत्यु हो जाती है और जहां हमेशा के लिए शरीर छूट जाता है वह मोक्ष हो जाता है।
शास्त्र में कहा गया कि शरीर एक नौका है। संसार रूपी समुद्र को पार करने के लिए इस शरीर का नौका के रूप में उपयोग किया जा सकता है। नौका निश्छिद्ध होनी चाहिए क्योंकि छेद वाली नौका डुबोने का काम कर सकती है। शरीर रूपी नौका में आश्रव छेद के समान हैं, जिनमें से कर्म पुद्गलों का आगमन होता है। यह शरीर अथवा जीवन रूपी नौका है, जीव नाविक है और संसार अर्णव-समुद्र है, जिसे महर्षि तर जाते हैं। शरीर के द्वारा संयम व तप की साधना की जाए तो यह तारने वाली नौका है परन्तु यदि शरीर के द्वारा पाप किए जाते हैं तो यह नौका डुबोने वाली भी हो सकती है। हमारा यह मानव जीवन बीत रहा है अतः शरीर जब तक स्वस्थ रहे, सक्षम रहे, जब तक बुढापा हावी न हो जाए तथा व्याधि शरीर में न बढ़े, इन्द्रिया कमजोर न हो तब तक धर्म का समाचरण करना चाहिए। संयम, तप, और साधना के माध्यम से भव सागर को पार करने का प्रयास करना चाहिए। पूज्य प्रवर ने आगे कहा कि अब जैन विश्वभारती लाडनूं निकट है। परम पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी लाडनूं में कितने विराजे और वहां कितने चातुर्मास किए। लाडनूं में लम्बा प्रवास निर्धारित है। साधु-साध्वियों भी वहां पहुंच रहे हैं। आज मुनिश्री कमलकुमारजी स्वामी, मुनिश्री श्रेयांसकुमारजी स्वामी ठाणा 4 गंगाशहर में चातुर्मास व लम्बा प्रवास करके पधारे हैं। उधर मुनि जयकुमारजी भी दो संत पधार गए हैं। खूब अच्छी धर्म प्रभावना होती रहे। मुनि श्रेयांसकुमारजी ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति देते हुए गीत का संगान किया। मुनि कमलकुमार जी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए सहवर्ती संतों के साथ गीत की प्रस्तुति दी। मुनि जयकुमार जी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।