आत्मशुद्धि का साधन है सद्भावना, नैतिकता, नशामुक्ति  : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 05 फरवरी, 2026

आत्मशुद्धि का साधन है सद्भावना, नैतिकता, नशामुक्ति : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी का गुरुवार को तेरापंथ धर्मसंध की राजधानी ‘लाडनूं’ में मंगल पदार्पण हुआ तो अपने आराध्य के चरणों का स्पर्श पाकर लाडनूं नगरी आलोकित हो गई। हर वर्ग, समुदाय, समाज के लोगों ने समूह बद्ध रूप में खड़े होकर पूज्य प्रवर की अगवानी की। शांति दूत अपने करकमलों से सबको आशीष देते हुए और मंगल पाठ सुनाते हुए लाडनूं नगर के भीतर गतिमान हुए। सबकी भावनाओं को पूर्ण करते हुए गुरुदेव को लगभग डेढ़ किमी के विहार में ही कई घंटे लग गए। विशाल जुलूस के साथ सभी का अभिनंदन स्वीकार करते हुए एक दिवसीय प्रवास हेतु भागचंद बरड़िया के निवास स्थान ‘भाग्यश्री’ में पधारे। इस अवसर पर समुपस्थित श्रद्धालुओं को अमृतदेशना प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि धर्म एक ऐसा तत्त्व है, जो परम मंगल होता है। धर्म का एक अर्थ है - आत्मशुद्धि का साधन। जिस उपाय से आत्मा निर्मलता को प्राप्त हो, वह उपाय धर्म होता है। कर्त्तव्य को भी धर्म के रूप में देखा जा सकता है, परन्तु अध्यात्म के संदर्भ में आत्मा की शुद्धि का साधन धर्म होता है।
अहिंसा धर्म है, संयम धर्म है, तप धर्म है। हम आम जनता को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति ये तीन बातें बताते हैं। सद्भावना अर्थात जाति, संप्रदाय आदि को लेकर दंगा-फसाद, मार-काट, हिंसा-हत्या आदि में नहीं जाना। सबके प्रति मैत्रीभाव रखना। अपनी ओर से किसी को भी अकारण तकलीफ नहीं दूं, सबके प्रति मंगल भावना रखूं। इन तीन बातों को बताते हैं और लोगों को संकल्प भी करवाते हैं। सभी प्राणियों के प्रति सद्भावना हो और उनके कल्याण की भावना हो तो आत्मा निर्मल हो सकती है। इसी प्रकार नैतिकता भी जीवन में हो तो जीवन अच्छा बन सकता है। व्यक्ति झूठ, कपट और चोरी से बचे तो मानना चाहिए कि उसके जीवन में ईमानदारी है। ईमानदारी ऐसी चीज है कि किसी भी धर्म को मानने वाला हो, अथवा नास्तिक भी क्यों न हो! सबके लिए कल्याणकारी है। ईमानदारी, अहिंसा और संयम ऐसे तत्व हैं जो मानवता के लिए हितकर हैं।
परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत की बात बताई। व्यक्ति जहा भी जाए अणुव्रत को साथ रखने का प्रयास करना चाहिए। ईमानदारी का संकल्प व्यक्ति के जीवन में रहना चाहिए। ईमानदारी को सर्वोत्तम नीति कहा गया है। ईमानदारी की राह में परेशानी आ सकती है परन्तु यदि मनोबल मजबूत हो तो अंतिम विजय ईमानदारी की ही होती है। अतः हम सभी को अपने जीवन में ईमानदारी की आधारना करने का प्रयास करना चाहिए। व्यक्ति को जीवन में झूठ, कपट व मिथ्या आरोपों से बचने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा अर्थात प्राणी मात्र के प्रति मैत्री की भावना होनी चाहिए। जीवन में संयम रहे, विचारों में उच्चता और व्यवहार में सादगी रहे तो जीवन अच्छा जी सकता है।
आचार्य श्री ने कहा कि आज हमारा लाडनूं में आना हुआ है परम पूज्य गुरुदेव तुलसी की जन्म स्थली, दीक्षा स्थली, उनके लम्बे प्रवास की भूमि, सप्तम आचार्य श्री डालगणी के प्रयाण की भूमि पर आज हमारा आना हुआ है। कल जैन विश्व भारती में प्रवेश होना है। बरड़ियाजी के यहां आना हो गया है। यहां की जनता में खूब अच्छी भावना रहे। कार्यक्रम में बालिका पृशा बालड़ ने अपनी प्रस्तुति दी। बरड़िया परिवार ने गीत का संगान किया।