गुरुवाणी/ केन्द्र
ज्ञान के साथ ध्यान रूपी आचार का प्रयोग रहे : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, अखंड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी का योगक्षेम वर्ष हेतु जैन विश्व भारती परिसर में बने ‘महाश्रमण विहार’ में विराजमान हो गए हैं। आज भी सुधर्मासभा में लाडनूं की ओर से नागरिक अभिनंदन का क्रम चला। इस क्रम में तेरापंथी सभा-लाडनूं के अध्यक्ष प्रकाशचंद बैद, तेरापंथ युवक परिषद् के अध्यक्ष सुमित मोदी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। लाडनूं ज्ञानाशाला के ज्ञानार्थियों की प्रस्तुति हुई स्थानीय तेरापंथ कन्या मंडल की कन्याओं ने भी अपनी प्रस्तुति दी। परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि आत्मा की शुद्धि अध्यात्म साधना का लक्ष्य होता है। वह शुद्धि धर्म की साधना के द्वारा हो सकती है। अध्यात्म की साधना के अनेक आयाम हैं जैसे अहिंसा की आराधना, संयम की साधना और तप का आसेवन। ये आत्म शुद्धि के उपाय हैं और इन सब चीजों का ज्ञान भी होना चाहिए। स्वाध्याय के द्वारा व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
हमारे जीवन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। पहले ज्ञान और फिर उस के अनुरूप आचरण। स्वाध्याय के द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है और स्वाध्याय के साथ ध्यान का भी महत्व है। व्यक्ति की एकाग्रता और चित्त की निर्मलता कितनी है, यह महत्वपूर्ण बात है और ध्यान के द्वारा इन्हें प्राप्त किया जा सकता है। ध्यान दो प्रकार से किया जा सकता है। एक तो व्यक्ति समय निकालकर, सब काम छोड़कर एक दो घंटा स्थिर होकर ध्यान करे। यह भी एक साधना का प्रयोग है। शरीर की स्थिरता जितनी सघन होती है वह मन की एकाग्रता में भी सहायक बन सकती है। अतः कायोत्सर्ग-शरीर की स्थिरता ध्यान साधना में सहायक बन सकते हैं। हम जैन विश्व भारती में स्थित हैं, जो एक ध्यान का भी केन्द्र है। यहां प्रेक्षा-ध्यान के नाम से ध्यान पद्धति चलती है। ध्यान की अनेक पद्धतियों है और सबके अलग-अलग सिद्धान्त और पद्धतियों हो सकती है। परन्तु ध्यान का सार है स्थिरता और निर्मलता। मनो योग, वचन योग और काय योग, इन तीनों योगों को अयोग की ओर ले जाना। योग निरोध होने से अयोग की साधना को प्राप्त होती है। जैन तत्त्व विद्या के अनुसार सम्पूर्ण अयोग को स्थिति चौदहवें गुणस्थान में प्राप्त होती है। हम योग साधना भी कह सकते हैं और अयोग साधना भी कह सकते हैं। दोनों का लक्ष्य एक हो। आचार्य हेमचंद्र ने कहा कि मोक्ष का जो उपाय है वह सब योग है। जो हमारी आत्मा को मोक्ष से जोड़ती है वह सब योग है। जैन तत्त्व विद्या के अनुसार शरीर, वाणी, और मन की प्रवृत्ति योग है। जब तक यह प्रवृत्ति रहेगी, मोक्ष प्राप्त नहीं होगा। प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर जाना अयोग की ओर बढ़ना होता है। जब शरीर, वाणी और मन की प्रवृत्ति का पूर्णतः निरोध हो जाता है अर्थात अप्रमत अवस्था आ जाती तो वह अयोग की स्थिति होती है। ध्यान प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में होना चाहिए। ‘ध्यान’ शब्द मानव जीवन के व्यवहार में बहुलता से प्रयुक्त होता है। व्यक्ति जो भी कार्य करे उसमें भाव क्रिया होनी चाहिए अर्थात जो कार्य करे उसमें पूर्णतः एकाग्रता रहे।
आचार्य प्रवर ने कहा कि अभी हम जैन विश्व भारती में हैं। यहां इतने साधु-साध्वियो, समणियां, मुमुक्षु बाइयां रहती हैं। लाडनूं परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी की जन्म भूमि, दीक्षा भूमि और कर्मभूमि भी है। यहां आचार्यश्री तुलसी ने लगातार दो-दो चातुर्मास किए हैं। गुरुदेव तुलसी जैन विश्व भारती परिसर में कितना-कितना भ्रमण किया करते थे। कल भी स्वागत का क्रम चला और वह आज भी चला है। लाडनूं को यदि पुरुष मान लें तो ‘जैन विश्व भारती’ उसका आभूषण है। ऐसी जैन विश्व भारती संस्था में हमारा लम्बे प्रवास के प्रयोजन में आना हुआ है। जीवन में धार्मिक-आध्यात्मिक रूप में पर-स्वकल्याण का प्रयास करते रहें। मुनि जयकुमारजी ने अपनी हर्षाभिव्यक्ति देते हुए आचार्यश्री के हरिद्वार और ऋषिकेश पधारने की प्रार्थना की तो करुणावतार ने भगवान महावीर, आचार्यश्री भिक्षुस्वामी, परम पूज्य गुरुदेव तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का स्मरण करते हुए कहा कि सन् 2028 के मर्यादा-महोत्सव के बाद यथासंभव तथा अनुकूलता के अनुसार हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, यमुनानगर व जगाधरी जाने का भाव है। आचार्य प्रवर की इस घोषणा के साथ ही पूरा प्रवचन पांडाल जयघोष से गूंज उठा। जैन विश्व भारती के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि कीर्तिकुमारजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। जैन विश्व भारती के ट्रस्टी राजेश दूगड ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुस्लिम समाज की ओर से लाडनूं शहर काजी ने अभिव्यक्ति देते हुए मुस्लिम समाज की ओर से अभिनंदन पत्र अर्पित किया। सर्व ब्राह्मण समाज, रावणा राजपूत समाज, जांगीड़ समाज, सैन समाज, रेगर समाज, भारत विकास परिषद, दिगम्बर जैन समाज, माली समाज, माहेश्वरी समाज, ओसवाल पंचायत, गणगौर मेला समिति, रामानंद गौशाला, स्वर्णकार समाज, विद्या भारती आदि अनेक संस्थाओं से संबद्ध व्यक्तियों ने श्रद्धाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल अध्यक्षा आरती कठौतिया, युवक परिषद की ओर से जवेरीमल दूगड़, अणुव्रत समिति की ओर से शांतिलाल बैद ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तत्पश्चात् लाडनूं के समस्त समाज की ओर से पूज्यप्रवर को अभिनंदन पत्र अर्पित किया गया।