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जैन जीवन शैली पर विशेष कार्यशाला का भव्य आयोजन
आचार्य महाश्रमण के सुशिष्य मुनि जिनेशकुमार ठाणा 3 के सानिध्य में तेरापंथ समा के तत्वावधान में संगम हॉल में जैन जीवन शैली कार्यशाला का आयोजन हुआ। इस अवसर पर मुनि जिनेश कुमार जी ने कहा- जन्म के साथ जीवन का प्रारंभ मरण के साथ जीवन का समापन होता है। जन्म और मरण' के बीच की अवस्थों जीवन है। जीवन जीना एक बात है जबकि कलात्मक ढंग से जीवन जीना दूसरी बात। आचार्य तुलसी द्वारा प्रदत्त नौ सूत्रीय जैन जीवन शैली के सूत्रों को अपनाने से व्यक्ति स्वस्थ वव्यवस्थित जीवन जी सकता है। इस शैली को कोई भी सम्प्रदाय वाला जी सकता है। इसमें कोई सम्प्रदाय की गंध नहीं है और न ही जातिवादी कल्पना का समावेश है। वर्तमान युग में जीवनशैली विकृत होता जा रही है।
आजकल इन्सान का जन्म हॉस्पिटल में बचपन होस्टल में जवानी होटल में और शेष रही सही जिन्दगी होस्पिटल ने ही बीतती है। यह प्रक्रिया संस्कार हनन की प्रक्रिया है। इसलिए व्यक्ति स्वस्थ सद्संस्कारी व चात्रिवान बनना चाहता है और शांति समाधि का जीवन जीना चाहता है तो सम्यकदर्शन, अनेकांत, अहिंसा समणसंस्कृति, इच्छापरिमाण, सम्यक आजीविका, सम्यक संस्कार, आहारशुद्धि, व्यसनमुक्ति, सधार्मिक वात्सल्य सूत्रों की आराधना करें। मुनि ने आगे कहा जहाँ क्रूरता है वहां हिंसा है, जहां करुणा है वहां दया है,अहिंसा है। व्यसन फैशन से हट कर धार्मिक स्वस्थ जीवन जीए। मनि कुणाल कुमारजी ने जैन जीवन शैली पर आधारित गीत को संगान किया। वरिष्ठ उपासक सुरेन्द्र सोठिया ने वक्तव्य में कहा धर्म से सद्गति होती है, पाप छोड़ने से परम गति होती है। तेरापंथ सभा लिलुआ के अध्यक्ष अनिल जैन ने स्वागत भाषण दिया। तेरापंथ महासभा के मुख्य ट्रस्टी सुरेश गोयल का सभा द्वारा सम्मान किया गया।