भक्ति की किश्ती से पार लगा दो

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शासनश्री साध्वी मंजू प्रभा

भक्ति की किश्ती से पार लगा दो

शासन मां ! (ओ) शासन मां
ध्यान धरते हैं, दिल से स्मरते है, दर्शन चाहते हैं।।
शासन मां। शासन मां!
भीगी पलकों से पंथ बुहारूं
मन वीणा के तारों को संकृत आज बनाऊं
दिल का तराना है, मन मस्ताना है, महफिल सजाते हैं।
भक्ति की किश्ती से पार लगा दो,
चाहों की नव राहों को, उज्ज्वलमय बना दो
उलझी अनुबंधों में, मोह निबंधो में, निजात चाहू मैं॥
सपनों की दुनिया का क्षणिक नजारा
अनुरंजित मन, पाएं शीघ्र किनारा
अमिट परछाई मिले, अन्तज्योति जले, वांछित फलते हैं॥
गुरु अनुरक्ति, कार्य कुशलता
हर दिल की धड़कन में, गूंजे मधुर तराना
अकथ कहानी है, सबकी जुबानी है, गौरव गाते हैं।।
अनुपम श्रध्दा का अर्घ्य चढ़ाऊं
अभिनव सरगम से, अंतर तान सुनाऊं
शिवसुख पाऊं मैं, तन्मय बन जाऊ मैं, अरमान सजाते हैं।।
लय - ओ मां!... तू कितनी अच्छी…