स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
चंचलता-निवारण
प्रेक्षाध्यान की पद्धति में कायोत्सर्ग को बहुत महत्त्व दिया गया है। उसको साधने के लिए शारीरिक स्थिरता, आसन की एकरूपता आवश्यक होती है। ग्यारहवें गीत में उल्लिखित है–
तन चंचलता मेट नैं, पद्मासन आप विराज रे।
अनिमेष प्रेक्षा
मानसिक एकाग्रता के विकास में त्राटक अथवा अनिभेष प्रेक्षा का प्रयोग बहुत सहायक होता है। भगवान महावीर भी उसका अभ्यास किया करते थे। एक बिन्दु पर दृष्टि को अपलक टिकाए रखना त्राटक या अनिमेष-प्रेक्षा है। इसी का निर्देश तीसरे गीत में प्राप्त है।
एक पुद्गल दृष्टि थाप नै, कीधो है मन मेरा समान के।
वीर और शान्त-रस
नौ रसों में वीर रस और शान्त रस एक-दूसरे से विरोधी स्वभाव वाले हैं। आध्यात्मिक साधना में इन दोनों की उपयोगिता है। तपस्या के लिए वीर रस और क्षमा के लिए शान्त रस का सेवन आवश्यक होता है। इनका उल्लेख चौथे गीत में किया गया है-
वीर रसे करी हो, कीधी तपस्या विशाल।
उपशम-रस नी हो, बागरी प्रभु वाण।
प्रथम गीत में शान्तरस का उल्लेख इस प्रकार किया गया है–
सवेग सरवर झूलता उपशम-रस लीना।
अनुराग से विराग
भौतिकता से विराग करने के लिए आध्यात्मिकता में अनुराग करना आवश्यक होता है। अनुरागाद् विरागः स्यातू । बाईसवें तीर्थकर अरिष्टनेमि ने अपनी भावी पत्नी राजीमती का परित्याग कर दिया। इसके कारण को खोज में कविवर अपनी कल्पना-शक्ति का उपयोग करते हुए कहते हैं- अरिष्टनेमि का प्रेम शिव-सुन्दरी (मुक्ति-स्त्री) के साथ हो गया था। इसलिए उन्होंने राजीमती को छोड़ दिया–
राजीमती छांड़ी जिनराय, शिव-सुन्दर स्यूं प्रीत लगाय।
विरोधाभास अलंकार
बाईसवें गीत में आचार्य प्रवर लिखते हैं—
राग-रहित शिव सुख स्यूं प्रीत, कर्म हणे बलि देष रहीत।
भगवन्! आप वीतराग हैं। फिर भी मुक्ति-सुखों से आपकी प्रीति है। आप द्देषरहित हैं। फिर भी कर्म-शत्रुओं का बखूबी हनन करते हैं।
अनुप्रास
काव्यपाठ को सरस बनाने में अनुप्रास अलंकार महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। प्रस्तुत काव्य में इसका भी प्रयोग हुआ है। उदाहरण स्वरूप उन्नीसवें गीत का निम्नाकित पद्य मननीय है-
जपत जाप खपत पाप तपत ही मिटायो।
मल्लिदेव त्रिविध सेव जग अछेरो पायो।।
स्त्री में पुरुषत्व का आरोपण
उन्नीसवें तीर्थकर मल्लिनाथ के बारे में जैन परंपरा में दो अभिमत हैं। दिगम्बर मत के
अनुसार वे पुरुष थे और श्वेताम्बर आम्नाय उन्हें स्त्री मानता है। जयाचार्य ने मल्लिनाथ के स्तवन में उन्हें पुरुष के रूप में व्याख्यात किया है। उन्होंने जननी की उपमा न देकर उन्हें जनक की उपमा से उपमित किया है-
जगदयाल! तूं ही कृपाल, जनक ज्यूं सुखदायो।
वत्सल नाथ स्वाम साहिब, सुजश तिलक पायो।।