स्वाध्याय
श्रमण महावीर
सिद्धसेन दिवाकर ने यही बात काव्य की भाषा में कही है- भगवन् ! सिन्धु में जैसे सरिताएं मिलती हैं, वैसे ही आपकी अनेकान्त दृष्टि में सारी दृष्टियां आकर मिल जाती हैं। उन दृष्टियों में आप नहीं मिलते, जैसे सरिताओं में सिन्धु नहीं होता।'
सत्य के विषय में चल रहा विवाद एकांगी दृष्टि का विवाद है। पांच अंधे यात्रा पर जा रहे थे। एक गांव में पहुंचे। हाथी का नाम सुना। उसे देखने गए। उनका देखना आखों का देखना नहीं था। उन्होंने छूकर हाथी को देखा। पांचों ने हाथी को देख लिया और चित्र कल्पना में उतार लिया। अब परस्पर चर्चा करने लगे। पहले ने कहा- 'हाथी खंभे जैसा है।' दूसरा बोला- 'तुम गलत कहते हो, हाथी खंभे जैसा नहीं है, वह केले के तने जैसा है।' तीसरा दोनों को झुठलाते हुए बोला- 'हाथी मूसल जैसा है।' चौथा बोला- 'तुम भी सही नहीं हो, हाथी सूप जैसा है।' पांचवां बोला- 'तुम सब झूठे हो, हाथी मोटी रस्सी जैसा है।' उन सबने अपने-अपने अनुभव के चित्र कल्पना के ढांचे में मढ़ लिये। अब एक रेखा भर भी इधर-उधर सरकने को अवकाश नहीं रहा। वे अपने-अपने चित्र को परम सत्य और दूसरों के चित्र को मिथ्या बतलाने लगे। विवाद का कहीं अन्त नहीं हुआ।
एक आदमी आया। उसके आखें थीं। उसने पूरा हाथी देखा था। वह कुछ क्षण अंधों के विवाद को सुनता रहा। फिर बोला- 'भाई! तुम लड़ते क्यों हो? उन्होंने अपनी सारी कहानी सुनाई और उससे अपने-अपने पक्ष का समर्थन चाहा। आगंतुक आदमी बोला- 'तुम सब झूठे हो।' पांचों चिल्लाए- 'यह कैसे हो सकता है?' हमने हाथी को छूकर देखा है।' आगंतुक बोला- 'तुमने हाथी को नहीं छुआ। उसके एक-एक अंग को छुआ। चलो, तुम्हारा विवाद हाथी के पास चलकर समाप्त करता हूं।' वह उन पांचों को हाथी के पास ले आया। एक-एक अंग को छुआकर बोला-
'तुम सच हो कि हाथी खंभे जैसा है, पर तुमने हाथी का पैर पकड़ा, पूरा हाथी नहीं पकड़ा।'
'तुम भी सच हो कि हाथी केले के तने जैसा है, पर तुमने हाथी की सूंड पकड़ी, पूरा हाथी नहीं पकड़ा।'
'तुम भी सच हो कि हाथी मूसल जैसा है, पर तुमने हाथी का दांत पकड़ा, पूरा हाथी नहीं पकड़ा।'
'तुम भी सच हो कि हाथी सूप जैसा है पर तुमने हाथी का कान पकड़ा, पूरा हाथी नहीं पकड़ा।'
'तुम भी सच हो कि हाथी मोटी रस्सी जैसा है, पर तुमने हाथी की पूंछ पकड़ी, पूरा हाथी नहीं पकड़ा।'
'तुम अपनी-अपनी पकड़ को सत्य और दूसरों की पकड़ को मिथ्या बतलाते हो, इसलिए तुम सब झूठे हो। तुम अवयव को अवयवी में मिला दो, खण्ड को अखण्ड की धारा में बहा दो, फिर तुम सब सत्य हो।'
विश्व का प्रत्येक मूल तत्त्व अखण्ड है। परमाणु भी अखण्ड है और आत्मा भी अखण्ड है। किन्तु कोई भी अखण्ड तत्त्व खण्ड से वियुक्त नहीं है। महावीर ने सापेक्षता के सूत्र से अखण्ड और खण्ड की एकता को साधा। उन्होंने रहस्य का अनावरण इन शब्दों में किया-'जो एक को जान लेता है, वह सबको जान लेता है। सबको जानने वाला ही एक को जान सकता है।'
आग्रही मनुष्य आंख पर आग्रह का उपनेत्र चढ़ाकर सत्य को देखता है और अनाग्रही युक्ति के अंचल में मनन का प्रयोग करता है।
आग्रही मनुष्य आंख पर आग्रह का उपनेत्र चढ़ाकर सत्य को देखता है और अनाग्रही मनुष्य अनन्त चक्षु होकर सत्य को देखता है।
भगवान् महावीर का युग तत्त्व-जिज्ञासा का युग था। असंख्य जिज्ञासु व्यक्ति अपनी जिज्ञासा का शमन करने के लिए बड़े-बड़े आचार्यों के पास जाते थे। अपने-अपने आचार्यों के पास जाते ही थे पर यदा-कदा दूसरे आचार्यों के पास भी जाते थे। इन जिज्ञासुओं में स्त्रियां भी होती थीं। भगवान् महावीर ने अपने जीवन-काल में हजारों-हजारों जिज्ञासाओं का समाधान किया। उनके सामने सबसे बड़े जिज्ञासाकार थे, उनके ज्येष्ठ शिष्य इन्द्रभूति गौतम। महावीर की वाणी का बहुत बड़ा भाग उनकी जिज्ञासाओं का समाधान है।