संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

(६) प्रतिसंलीनता
यह बाहर और भीतर के संक्रमण का द्वार है। इसका अर्थ है-अपनी समस्त वृत्तियों के मुख को बाहर से भीतर की ओर मोड़ना। चेतना की धारा इन्द्रियों के माध्यम से जो प्रतिक्षण बहकर प्रवाहित हो रही है, उसे मोड़कर अन्दर की तरफ गति देना। 'अणुसोयसुहोलोगो' - अनुस्रोत में चलना सरल है, सारा संसार चल रहा है। किन्तु प्रतिस्रोत मूल उद्गम की ओर नदी का बहना कठिन है। प्रतिसंलीनता उद्गम की ओर प्रयाण है। यह संसार का पार है। अनुस्रोत पार नहीं है, संसार है, चक्र है। अनन्त जन्मों से बाहर जाने का जो अभ्यास है, प्रतिसंलीनता उसे तोड़ती है। यह पुनः अपने में संलीन होने का सूत्र है।
चित्त चेतना से जुड़ता है तब सचेतन होता है और बिछुड़ता है तब जड़। हमारा चित्त प्रायः यंत्रवत् है। चेतना से उसका सम्पर्क बहुत कम रहता है। महावीर ने कहा- 'अगेणचित्ते खलु अयं पुरिसे'- मनुष्य अनेक चित्तवाला है। चेतना से जुड़े रहने वाला चित्त बहुत नहीं होता। एक साथ अनेक काम करना अनेक चित्तता की सूचना है। जीवन में जो कुछ चलता है वह सब यान्त्रिक है। पश्चिम के विचारशील व्यक्ति कोलीन विल्सन ने कहा है-जब हम कुशल हो जाते हैं तो हमारे भीतर जो एक रोबोट-यंत्रमानव है वह काम शुरू कर देता है। चेतना की उपस्थिति अनिवार्य नहीं होती है। हर रोज घर से बाहर और बाजार से घर यातायात करते हैं। कुछ सोचना, विचारना और देखना नहीं पड़ता, किन्तु जैसे ही कहीं अपरिचित स्थान में जाते हैं वहां सतर्क होना पड़ता है। यंत्र मानव की वहां नहीं चलती। मनोवैज्ञानिकों का कहना है-सात वर्ष में जो आप सीख लेते हैं, आपके पूरे जीवन में ७५ प्रतिशत वही पीछा करता है। क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, प्रेम आदि जीवन भर चलते हैं। क्योंकि वही सीखा हुआ था। प्रतिसंलीनता इन सबको समाप्त करने का एक साहसिक कदम है। अपने घर में प्रविष्ट होने के लिए सतर्क होना होगा। बाहर से संबंध-विच्छेद करना होगा, चेतना को बाहर ले जाने वाले समस्त आलंबनों से दूर हटना होगा। मनोविज्ञान की भाषा में वृत्तियों का मार्गान्तरीकरण, संस्करण, उच्चध्येय में प्रवाहित करना है।
आंतरिक तप के प्रकार
(१) प्रायश्चित्त
अन्तर् तप का यह शुभारंभ है। व्यक्ति की दृष्टि दूसरों से हटकर स्व-पर केन्द्रित हो जाती है। वह स्वयं को देखता है, 'मैं कैसा हूं' भला हूं या बुरा, सही हूं या गलत। प्रायश्चित्त का अर्थ है-चित्त-शोधन। जब तक व्यक्ति को स्वयं का बोध नहीं होता, तब तक चित्त शोधन कठिन है। अनेक व्यक्ति एक ही प्रकार की भूलों को बार-बार दोहराते हैं। एक भूल का प्रायश्चित्त करते हैं और संकल्प करते हैं कि अब फिर नहीं करूंगा, किन्तु कुछ ही समय बाद वे फिर उसी की पुनरावृत्ति कर लेते हैं।