आचार्य भिक्षु अहिंसा के व्याख्याकार थे

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आचार्य भिक्षु अहिंसा के व्याख्याकार थे

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमारजी के सान्निध्य में तथा तेरापंथ सभा के तत्वावधान में आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी के तीसरे चरण का त्रिदिवसीय कार्यक्रम तेरापंथ भवन में आयोजित हुआ। इस अवसर पर आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी ने कहा आचार्य भिक्षु का जन्म पंचम अर में मारवाड़ के कंटालिया ग्राम में हुआ। वे प्रसन्नचित थे। उनमें चंद्रमा जैसी निर्मलता, सूर्य जैसी तेजस्विता और सागर जैसी गंभीरता के समान उनमें दर्शन होते थे। उनका विराट व्यक्तित्व सब को आकर्षित करने वाला था। उनका आभा मंडल निर्मल और पवित्र था। उनका जीवन संघर्ष से ओतप्रोत था। उनके जीवन में अनेक उतार चढ़ाव आए। वे कष्टों से घबराए नहीं वे हमेशा सत्य के मार्ग पर चले। आचार्य भिक्षु के तीन दृष्टांत की चर्चा करते हुए मुनि ने कहा कि आचार्य भिक्षु अहिंसा के व्याख्याकार थे। अहिंसा का उद्देश्य जीव रक्षा नहीं होकर आत्म रक्षा होना चाहिए। भगवान महावीर ने अहिंसा को संयम की उपज बताया है। आचार्य भिक्षु ने धर्म की अनेक कसौटियां बताई उसमें एक कसौटी है हृदय परिवर्तन। उपदेश में धर्म है ,जबरदस्ती में धर्म नहीं है। मुनि ने आगे कहा आचार्य भिक्षु अनुशासन प्रिय संत थे। वे स्वयं अनुशासन में रहते थे और दूसरों को भी अनुशासन में रहने की प्रेरणा देते थे। अनुशासन हीनता उन्हें बर्दाश्त नहीं थी। जिन्होंने भी अनुशासन मर्यादा का लोप किया उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही हुई। मुनि ने आगे कहा आचार्य भिक्षु अभाव में जिएं लेकिन कभी भी उन्होने अभाव महसूस नहीं किया। वे हमेशा जागरुक रहे और साधना का जीवन जिया। मुनि कुणाल कुमार ने गीतका संगान किन। तेरापंथ सभा के अध्यक्ष अनिल जैन ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। आभार सभा मंत्री शरद लूनिया और संचालन मुनि परमानंद जी ने किया।