गुरुवाणी/ केन्द्र
व्यवहार में निक्षेप की है अत्यंत महत्ता : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। साध्वी वृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वाङ्मय पर आधारित अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि हम व्यवहार के जगत में जी रहे हैं। संसारी प्राणी और विशेषतः संज्ञी मनुष्यों का व्यवहार तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है - शब्दाश्रयी व्यवहार, अर्थाश्रयी व्यवहार और ज्ञानाश्रयी व्यवहार। व्यवहार अर्थात् लेनदेन करना, कोई बात बताना, किसी को बुलाना, नाम से पुकारना, कुछ कहना-सुनना, किसी वस्तु का आदान प्रदान करना आदि जीवन के व्यवहार हैं। शरीर होने से व्यवहार भी अनिवार्य हो जाते हैं। सिद्ध भगवन्तों को हम व्यवहार मुक्त अथवा व्यवहार से ऊपर कह सकते हैं। चौदहवें गुणस्थान के महामुनि अयोगी अवस्था को प्राप्त शैलेषी अवस्था में स्थित हैं उन्हें भी व्यवहार मुक्त अवस्था में देखा जा सकता है।
व्यवहार की व्यवस्था सुचारू रूप से चले इस संदर्भ में निक्षेप की आवश्यकता होती है। वस्तु बोध की दृष्टि निक्षेप है। यदि निक्षेप व्यवस्था न हो तो व्यवहार भी काठिन्यपूर्ण हो सकता है। शब्दाश्रयी, अर्थाश्रयी और ज्ञानाश्रयी व्यवहार की आपस में सम्यक् व्यवस्था रहे तो व्यवहार ठीक चल सकता है। उदाहरणार्थ गुरु, शिष्य से प्रमार्जनी लाने हेतु कहते हैं तो विनीत शिष्य प्रमार्जनी लाकर तत्काल गुरु को सौंपते हैं। यहां गुरु ने प्रमार्जनी बोला तो शब्दाश्रयी से इस वस्तु की जानकारी हुई। शिष्य को अर्थाश्रयी से इस बात का बोध हुआ कि प्रमार्जनी इसी वस्तु को कहा जाता है। अगर यह बोध न हो कि इसी वस्तु का नाम प्रमार्जनी है तो फिर वह वस्तु नहीं आ पाएगी। यह ज्ञानाश्रयी व्यवहार है। नियत, निश्चित वस्तु का बोध कराने वाला निक्षेप होता है। प्रमार्जनी शब्द वस्तु विशेष के लिए निर्धारित है और अन्य सब वस्तुएं निराकृत हो जाती है, यह नाम निक्षेप है।
वस्तु को जानने के लिए नाम निक्षेप की कितनी महत्ता होती है? इसी प्रकार किसी आकृति, फोटो इत्यादि को देखने मात्र से उसका नाम आदि ध्यान में आ जाता है। इस प्रकार मूल चीज के भाव की भूत भावी अनुपयोगी पर्याय को जानना द्रव्य निक्षेप है, इसके द्वारा भी हम ज्ञान कर सकते हैं और वास्तव में उस स्थिति को प्राप्त कर लेना भाव निक्षेप है। ये हमारे व्यवहार के महत्त्वपूर्ण आयाम है, जिनके बिना हमारा व्यवहार चलना बहुत मुश्किल हो सकता है। व्यवहार में निक्षेप का बहुत बड़ा हाथ होता है। यह कहा जा सकता है कि वस्तु बोध की दृष्टि ही निक्षेप है। आज भी पूज्य प्रवर ने चिंतन हेतु साधु-साध्वियों, समणियों को विषय प्रदान किये। तत्पश्चात् चारित्रात्माओं को जिज्ञासा हेतु अवसर प्रदान किया और उनका समाधान प्रदान किया। पूज्य प्रवर द्वारा चलाया जा रहा यह क्रम चारित्रात्माओं के अतिरिक्त अन्य सब लोगों के लिए भी ज्ञान वर्धक सिद्ध हो रहा है।