अहिंसा, संयम और तप रूपी धर्म रहे हमारे साथ : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 19 फरवरी, 2026

अहिंसा, संयम और तप रूपी धर्म रहे हमारे साथ : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन विश्व भारती में लगभग 37 वर्षों बाद योगक्षेम वर्ष के शुभारंभ का सुअवसर। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर के ‘सुधर्मा सभा’ में पधारे तो पूरा वातावरण जय घोष से गुंजायमान हो उठा। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। साध्वी वृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया।0
शांति दूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को योगक्षेम वर्ष के मंगल शुभारंभ के सुअवसर पर मंगल पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि योगक्षेम वर्ष सन् 2026-2027 के शुरू हो चुकने की मैं घोषणा करता हूँ। आगम में योगक्षम शब्द आया है। योगक्षेम वर्ष के नाम में दो शब्द योग और क्षेम, दो शब्दों का समस्त रूप है, यह हमारा आगम का आधार है। आगम में यह शब्द ‘योगक्षेम’ आया है अतः यह मानना चाहिए कि आगमिक आधार पर योगक्षेम वर्ष का नामकरण हुआ है। भगवान ऋषभ और भगवान महावीर से जुड़ा हुआ हमारा जैन शासन है और इस जैन शासन के अन्तर्गत दिगम्बर और श्वेतांबर ये दो धाराएं बह रही है। श्वेतांबर धारा में एक आम्नाय तेरापंथ है जिसके प्रवर्तक आद्य अनुशास्ता परम पूज्य आचार्यश्री भिक्षु हुए हैं। आचार्य भिक्षु की परंपरा में उनके उत्तराधिकारियों की परंपरा चली। उनके अनंतर उत्तराधिकारी आचार्य श्री भारमल जी स्वामी हुए और आचार्य परंपर आगे बढ़ी जिसमें अष्टम आचार्य श्री परम स्तवनीय आचार्यश्री कालूगणी हुए। आचार्यश्री कालूगणी का जन्म स्थान लाडनूं के निकट ही ‘तालछापर’ है। उनके समय में धर्मसंघ का विकास भी हुआ। विशेष बात यह है कि उनके द्वारा दीक्षित सुशिष्य मुनि तुलसी और मुनि नथमलजी (टमकोर) हमें आचार्य के रूप में प्राप्त हुए। कालूगणी के अनंतर उत्तराधिकारी परम श्रद्धेय आचार्यश्री तुलसी व उसके बाद परम स्तवनीय आचार्यश्री महाप्रज्ञजी हुए। उनके दोनों ही सुशिष्य जो हमें आचार्य प्रवर के रूप में मिले वे दोनों ही आचार्य ‘युगप्रधान’ की गरिमा से भी मंडित हुए थे। ये दो आचार्य ऐसे हुए हैं, जिनको हम में से कईयों ने प्रत्यक्ष भी देखा है, उन्हें नमन भी किया है और पूज्य कालूगणी हमारे गुरुओं के भी गुरु थे, आज परम पूज्य कालूगणी का जन्म दिवस है।
आचार्यश्री तुलसी के समय योगक्षेम वर्ष प्रारंभ भी हुआ था और संपन्न भी हुआ था। लगभग उसी प्रांगण में आज योगक्षेम वर्ष की पुनरावृत्ति हुई है। आचार्यश्री तुलसी के जीवन के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में सन् 1989-1990 में वह आयोजित हुआ था। उस योगक्षेम वर्ष की आयोजना में महाश्रमणी साध्वी प्रमुखा कनकप्रभाजी ने आचार्यश्री तुलसी के समय भी योगक्षेम वर्ष का निवेदन रखा था और उन्होंने ही मेरे सामने भी उसका निवेदन रखा था। उनके कथन को स्वीकार कर योगक्षेम वर्ष की घोषणा की। आज कई वर्षों बाद वह घोषणा साकार हुई है। जिन्होंने निवेदन किया था वे तो अब सदेह उपस्थित नहीं है परन्तु उस निवेदन के संदर्भ में साध्वी प्रमुखा अब विश्रुत विभाजी को मान लेता हूँ। आज योगक्षेम वर्ष प्रारंभ हो गया है। हमारे धर्मसंघ के लिए यह योगक्षेम वर्ष खूब अच्छा सिद्ध हो, मंगलमय हो। इस वर्ष के दौरान यदि हम अहिंसा की आराधना करते हैं, संयम की साधना करते हैं और तपते है तो अहिंसा, संयम और तप रूपी धर्म हमारे साथ है तो यह वर्ष मंगलमय हो ही जाएगा। अनन्तर पूर्ववर्ती तीन दिनों में अनुष्ठान का क्रम चला इससे माना कि योगक्षेम वर्ष रूपी प्रसाद का शिलान्यास हो गया था। अब योगक्षेम वर्ष की कालावधि शुरू हो चुकी है। यह वर्ष यथा संभव हमारे लिए विकास में सहायक बने। इस वर्ष में अनेक विषयों जैसे तत्त्वज्ञान, प्रेक्षाध्यान, जैन दर्शन, तेरापंथ दर्शन, आदि के प्रशिक्षण का कार्य चलता रहे। साथ ही यह वर्ष चिंतन, मंथन, मनन के लिए भी हो सकता है। आचार, विचार, संस्कार, साधना, आदि के संदर्भ में चिंतन-मंथन करें कि कैसे हमारे धर्म संघ की साधना पुष्ट हो, वर्धमान हो। इस प्रकार एक आयाम प्रशिक्षण और दूसरे आयाम चिंतन-मंथन के द्वारा योगक्षेम वर्ष को अच्छा बनाने का प्रयास किया जा सकता है।
इस योगक्षेम वर्ष की कालावधि के समय तक ज्ञानात्मक दृष्टि से बहिर्विहार में रहने वाले साधु-साध्वियां भी यदि ठिकाणे में सहज रूप में यू-ट्यूब आदि के माध्यम से प्रसारण हो रहा है तो उसे देख सकते हैं। इसके लिए अनापत्ति है। इस दौरान चलने वाले शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद परीक्षा के पश्चात् ही कोई उपाधि या डिग्री प्रदान की जाए। हमारे अष्टम आचार्यश्री कालूगणी का जन्म दिवस है। आज का दिन अणुव्रत, पारमार्थिक शिक्षण संस्था से जुड़ा हुआ है। यह वर्ष धर्म संध को ऊँचाई प्रदान करने वाला सिद्ध हो। मंगल प्रवचन पश्चात् आचार्य प्रवर ने उपस्थित चारित्रात्मओं को अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। इसके बाद तत्त्व ज्ञान के विद्यार्थियों, प्रेक्षाध्यान के शिविरार्थियों को मंगल पाथेय प्रदान किया। तत्पश्चात् आचार्यश्री के ‘ठाणं’ प्रवचन के आधार पर जैन विश्व भारती द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘आठ बातें ज्ञान की’ को आचार्य प्रवर के समक्ष लोकार्पित किया गया। मुमुक्षु बहिनों ने गीत का संगान किया। राकेश मणि ने संस्कृत भाषा में अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ समाज छापर ने गीत का संगान किया।