गुरुवाणी/ केन्द्र
ज्ञान से बड़ा कोई गुरु नहीं :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आज के कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। साध्वी वृंद द्वारा प्रज्ञा गीत का संगान किया। शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि आध्यात्मिक वाङ्मय में मोक्ष-मुक्ति की बात आती है और जीवन का परम, अनुत्तर और अंतिम लक्ष्य मोक्ष होना चाहिए। मोक्ष मार्ग चार अंगों वाला बताया गया है - ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप। ज्ञान से जीव भावों की, पदार्थों को जानता है, दर्शन से श्रद्धा करता है, चारित्र से कर्मों के आगमन के मार्ग को निरूद्ध करता है और तप से आत्मा का परिशोधन करता है।
ज्ञान अपने आप में एक लब्धि है। दुनिया में अपार ज्ञान है। इतना अध्ययन करना सामान्य व्यक्ति के लिए मुश्किल है। व्यक्ति के पास समय बहुत थोड़ा है तथा जीवन में अनेक कार्य तथा कठिनाईयां भी आ सकती है, ऐसी स्थिति में मार्गदर्शन दिया गया है कि जो सारभूत हो और अपने लिए उपयोगी हो, वैसे ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए, जिस प्रकार हंस पानी में से दूध को निकाल लेता है। पुस्तकें ज्ञान प्राप्ति का एक माध्यम है। यद्यपि पुस्तकें, आगम आदि अजीव हैं फिर भी आगमों का सम्मान करना चाहिए। आगम को पढें तो उन्हें अच्छे स्थान पर रखने का प्रयास करना चाहिए। सभी को ज्ञान की आराधना में अपने समय को नियोजित करने का प्रयास करना चाहिए। परम पूज्य आचार्यवर ने आज भी साधु-साध्वियों, समणियों को चिंतन हेतु बिंदु प्रदान किए। तत्पश्चात् जिज्ञासाएं प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। अनेक साधु-साध्वियों समणियों ने अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत की तथा आचार्य प्रवर ने समाधान प्रदान किया। यह दृश्य उपस्थित चारित्रात्माओं के साथ ही श्रद्धालुओं के लिए भी ज्ञान वर्धक रहा।