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प्रेक्षाध्यान कार्यशाला का हुआ आयोजन
आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी ठाणा 3 के सान्निध्य में तथा तेरापंथ महिला मंडल के तत्त्वावधान में कोन्ननगर व रीसड़ा सभा भवन में प्रेक्षाध्यान कार्यशाला का आयोजन हुआ। इस अवसर पर मुनि जिनेश कुमारजी ने कहा, ध्यान प्रकाश की ज्योति की साधना है। ध्यान परिवर्तन की प्रक्रिया है। शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन की त्रिवेणी है। ध्यान से वृत्तियों का परिष्कार होता है। मुनि ने आगे कहा-धर्म आत्म साधना का उपयोगी तत्व है। धर्म का परिणाम ही क्रांति और शांति है। वही धर्म श्रेष्ठ होता है जिसमें परिवर्तन होता है और शांति मिलती है। धर्म का एक भेद ध्यान है। ध्यान आभ्यन्तर तप है। ध्यान से निर्विचारता, निर्विकारता, निर्विकल्पता का विकास होता है। ध्यान का अर्थ है राग द्वेष से दूर होना, वीतरागता का अनुभव करना। जहां राग, द्वेष है वह ध्यान नहीं होता है । ध्यान कां उद्देश्य है चित्त की शुद्धि और मानसिक प्रसन्नता, ज्ञाता तुल्य भाव के साथ आत्मा को देखना। अपने दोषों को देखना । प्रेक्षा ध्यान आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी के उर्वरा मस्तिष्क की देन है। आचार्यश्री तुलसी के सानिध्य में आचार्य महाप्रज्ञजी ने वर्षों तक ध्यान साधना के नाना प्रयोग किए। नवनीत के रूप में प्रेक्षाध्यान प्राप्त हुआ। प्रेक्षाध्यान की साधना आध्यात्मिकता वैज्ञानिकता से अनुप्राणित है। मुनिजी ने प्रेक्षाध्यान व अनुप्रेक्षा के प्रयोग कराएं।