धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

इसका आगमिक आधार है-
जहा य किंपागफला मणोरमा,
रसेण वण्णेण य भुज्जमाणा।
ते खुडुए जीविय पच्चमाणा
एओवमा काम गुणा विवागे।।
जैसे किंपाक फल खाने के समय रस और वर्ण से मनोरम होते हैं और परिपाक के समय जीवन का अन्त कर देते हैं। कामगुण भी विपाक-काल में ऐसे ही होते हैं।
उत्तराध्ययन ३२/२०
जहा किंपाग फलाणं, परिणामो न सुन्दरो।
एवं भुत्ताण भोगाण, परिणामो न सुन्दरो ।।
जिस प्रकार किंपाक फल खाने का परिणाम सुन्दर नहीं होता, उसी प्रकार भोगे हुए भोगों का परिणाम भी सुन्दर नहीं होता।उत्तराध्ययन १६/१७
अध्यात्म साधना के क्षेत्र में ब्रह्मचर्य की साधना का बहुत मूल्य है। यह जीवन की बहुत बड़ी सम्पत्ति है। निर्मल ब्रह्मचर्यं पालने वालों को देव आदि भी नमस्कार करते हैं। उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है-
देव दाणव गंधव्वा, जक्ख-रक्खस-किन्नरा।
बंभयारिं नमंसंति, दुक्करं जे करंति तं ।।
उस को देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, और किन्नर-ये सभी नमस्कार करते हैं, जो दुष्कर ब्रह्मचर्य का पालन करता है।
उत्तराध्ययन १६/१६
ब्रह्मचर्य की सुरक्षा के लिए आगमों में 'नवबाइ' का भी विधान है। चौबीसी में ब्रह्मचर्य-शुद्धि के लिए बार-बार सचेत किया गया है-
अहो प्रभु! रमणी राखसणी कही,
विषबेली मोह जाल हो। २/४
त्रीयादिक नां संग ते, आलंबन दुख दातार रे। ११/६
वनिता जाणी वेतरणी, शिव सुन्दर वरवा हूंस घणी। १२/२
स्त्री स्नेह पासा दुर्दन्ता, कह्या नरक निगोद तणां पंथा १२/५
मूल आगम में इस प्रकार पाठ मिलता है-
नो रक्खसीसु गिज्झेज्जा, गंडवच्छासुऽणेगचित्तासु ।
मुनि वक्ष (स्तनों) में ग्रंथि वाली, अनेक चित्त वाली तथा राक्षसी की भांति भयावह स्त्रियों में आसक्त न बने! - उत्तराध्ययन ८/१८
चौबीसी में २४ तीर्थकरों की स्तुति है। इसका मूल आधार उक्कित्तणं (लोगस्स उज्जोयगरे') – 'लोगस्स' का पाठ है जिसमें चौबीस तीर्थकरों का स्तवन है। इसे चउवीसत्थव (चतुर्विंशतिस्तव) भी कहा जाता है।
चौबीसवें गीत में कहा गया है-
निंदा नै स्तुति समपणै रे, मान अनै अपमान ।
इसका आगमिक आधार है-
लाभालाभे सुहे दुक्खे, जीविए मरणे तहा।
समो निंदा पसंसासु, तहा माणावमाणओ।।
मुनि लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, जीवन-मरण, निन्दा-प्रशंसा और मान-अपमान इन सभी द्वन्द्वात्मक स्थितियों में सम रहे।
चौबीसी में निहित अनेक तथ्यों का आधार हमें आगम-साहित्य में मिलता है। इस प्रकार चौबीसी का आगम के आलोक में अवलोकन किया जाए तो हमें पता चलेगा कि यह ग्रन्थ स्तुति-मात्र नहीं, आगमिक ज्ञान प्रदान करने वाला भी है। प्रस्तुत निबन्ध तो उसका एक निदर्शन मात्र है।