स्वाध्याय
संबोधि
बाहुबलि का इतिहास स्पष्ट है। सब कुछ त्यागकर भी उन्होंने अहं को बचा लिया था। एक
वर्ष तक वे प्रतिमा की तरह निश्चेष्ट शांत खड़े रहे। बड़ा दुर्धर्ष तप था। किन्तु अहंकार के कारण वे स्वयं से दूर थे। अहंकार का उपनयन नहीं किया। जैसे ही 'अहं' का भान हुआ और अपने
भीतर के इस महान् अविजित शत्रु को देखा तो बाहुबलि को स्वयं पर तरस आया। हाँ! कैसा
विचित्र व्यक्ति हूं मैं! जिसे सबसे पहले छोड़ने का था, मैं पत्थर की तरह उसका भार अब भी ढोये जा रहा हूं। एक क्षण में सर्प जैसे कंचुकी को छोड़ता है, बाहुबलि उससे मुक्त हो गये। अंधकार आलोक में परिवर्तित हो गया।
'मैं अहंकार साधना-मार्ग में महान् विघ्न हूँ। महान् साधक स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा है, 'अहंकार का त्याग हुए बिना ईश्वर की कृपा नहीं होती।' ईश्वर के घर के दरवाजे के रास्ते में अहंकार रूपी ठूंठ पड़ा हुआ है। इसे पार किये बिना कमरे में प्रवेश नहीं किया जा सकता। अहंकार है इसलिए ईश्वर के दर्शन नहीं होंते। कहीं अहंकार न हो जाए, इसलिए 'मैं' का प्रयोग करना भी एक बार किसी के देखा देखी रामकृष्ण ने बन्द कर दिया था। अहंकार बड़ा सूक्ष्म है। साधक अपनी प्रत्येक लघुतम शारीरिक और मानसिक प्रवृत्ति के प्रति अत्यन्त जागरूक रहे तो उसे अनुभव हो सकता है कि कब कैसे अहंकार उठता है? अहंकार के विसर्जन के लिए उसके प्रति सचेष्ट होना पहला चरण है। 'मैं' (अहं) का विसर्जन विनय होना चाहिए। स्वयं को सब तरह से परमात्मा के अवतरण के लिए खाली कर लेना। अहं के शून्य होने से ही मानसिक, वाचिक और कायिक विनय प्रतिफलित हो सकता है। व्यक्ति का रूपान्तरण अन्यथा असंभव है। बाहर से व्यक्ति बड़ा विनम्र बनता है, झुकता है, किन्तु भीतर अहं 'मैं' अकड़ा रहता है। महावीर कहते हैं-'अहंकार को जीते बिना व्यक्ति मृदु-विनम्र नहीं बन सकता।' विनम्रता का अर्थ है-अहं-'मैं' का मिट जाना, शून्य हो जाना। आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने लिखा है-'विनय का वास्तविक अर्थ है-अपने आपको बिल्कुल खाली कर देना, अहं से मुक्त कर देना, केवल अपने स्वरूप की स्थिति में चले जाना, बाहर से जो कुछ भरा हुआ है, उससे मुक्त हो जाना। इतना रेचन करना पड़ता है कि मन खाली हो जाये। विनय की सारी प्रक्रिया रेचन की प्रक्रिया है। विनय में कषाय का विवेक होता है। विवेक का अर्थ है-पृथक् करना। पृथक् करने का अर्थ है-रेचन करना, निकालना। इसी का नाम है 'विनयनम्'। जब तक आदमी खाली नहीं होता तब तक विनय के द्वारा जो समाधि प्राप्त होनी है वह नहीं होती। विनय की चार अपेक्षाएं हैं-
१. गुरु के अनुशासन को सुनना।
२. गुरु जो कहता है उसे स्वीकार करना।
३. गुरु के वचन की आराधना करना।
४. अपने मन को आग्रह से मुक्त करना।