बसंतऋतु के आगमन से पूर्व होली का पर्व परस्पर मिलन का पर्व

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मुनि चैतन्य कुमार 'अमन'

बसंतऋतु के आगमन से पूर्व होली का पर्व परस्पर मिलन का पर्व

संसार में जितने पर्व मनाएं जाते है, उनमें से सर्वाधिक पर्व भारत वर्ष में मनाएं जाते है। चाहे वे लौकिक अथवा लोकोतर। होली, दीवाली, रक्षाबंधन आदि अनेक पर्व है, जो लौकिक दृष्टि से मनाएं जाते है। कुछ पर्व राष्ट्रीय तथा आध्यात्मिक दृष्टि से मनाने की परम्परा रही है। पर्वों की अपनी सार्थकता भी है क्योंकि पर्वों के साथ जुड़ी है- शारीरिक, मानसिक, भावात्मक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण। चार गति चौरासी लाख जीवा योनियों में एक मात्र मानव जीवन है जिसमें पर्व मनाएं जाते है। क्योंकि अन्य योनियों में मानसिक विकास का स्तर बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर होता है या यों कहा जा सकता है कि मानसिक विकास नहीं के बराबर होता है। अतः ये पर्व विशेष रूप से मानव ही मनाता है। होली का पर्व भी शारीरिक के साथ मानसिक और भावनात्मकता के साथ जोड़ा जा सकता है। यदि मानव पर्वो की आत्मा को पहचानने का पुरुषार्थ करे तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। किन्तु देखा जाता है कि आम आदमी पर्व के अवसर पर रंग-गुलाल आदि रंगों से खेल कर इति श्री कर देता है। जबकि रंग मानव जीवन में अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हो सकते है। शारीरिक दृष्टि तो रंगों का प्रभाव होता ही है किन्तु मानसिक और आध्यात्मिक पक्ष पर नजर डाले तो यह बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। आज चिकित्सा के क्षेत्र में कलर थेरेपी के प्रयोग शारीरिक स्वास्थ्य में लाभकारी सिद्ध हो रहे है। मन में उठने वाली तरंगों के साथ जब रंगों को जोड़ दिया जाता है तब उसका प्रभाव कुछ अलग ही होता है। रंगों का प्रभाव ज्ञानी व्यक्तियों के अनुभव और मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए। रंगों के प्रयोग से व्यक्ति को शांत अथवा उतेजित भी किया जा सकता है। रंगों का होता है अचूक प्रभाव। जीवन को आध्यात्मिकता के साथ जोड़ने वाला सफल जीवन जी सकता है। जैन परम्परा में नमस्कार महामंत्र विभिन्न रंगों पर आधारित है। सद्‌गुरू के निर्देशन में जब रंगों के साथ नमस्कार महामंत्र का ध्यान किया जाता है। तो उसका अचिन्त्य लाभ प्राप्त करके संतुष्टि का अनुभव करता है। यद्यपि पर्व एक दिन के लिए आता है किन्तु रंगों का प्रयोग प्रतिदिन किया जा सकता है। पर्वों की महत्ता को समझने वाला ही पर्व की सार्थकता सिद्ध कर सकता है। तथा पर्वों की महता समझने वाला ही जीवन की सार्थकता सिद्ध कर सकता है। पर्व के हर्ष उल्लास की अभिव्यक्ति कैसे करना चाहिए। जीवन में पर्व आते जाते रहेगें किन्तु विरले व्यक्ति होते है जो सही रूप में पर्व का आनंद ले पाते है। जैन, बौद्ध, सिख, सनातन, इस्लाम सभी सम्प्रदायों में पर्व मनाने की परम्परा रही है अतः मानवीय चेतना को जागृत करके पर्व को मनाएं तथा उसका यथेष्ठ रूप में लाभ लेने का प्रयत्न हो। यह आवश्यक है। होली का पर्व रंगों का पर्व है जिस प्रकार रंग एक दूसरे से मिल जाते है वैसे ही मानव-मानव को परस्पर मिलनसार बनने का प्रयास करना चाहिए।