आगमवाणी श्रवण करने का अवसर मिलना सौभाग्य की बात : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 18 फरवरी, 2026

आगमवाणी श्रवण करने का अवसर मिलना सौभाग्य की बात : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन विश्व भारती परिसर में बने भव्य सुधर्मा सभा में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में चल रहे त्रिदिवसीय अनुष्ठान का आज अंतिम दिवस था। शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को आध्यात्मिक अनुष्ठान के अन्तर्गत विभिन्न मंत्रों का जप कराया। तत्पश्चात् मुनि कुमारश्रमणजी ने प्रेक्षाध्यान संदर्भ विशेष जानकारी प्रदान की। मुनि योगेश कुमारजी ने तत्त्वज्ञान की कक्षाओं से संबंधित जानकारी दी। साध्वी कनकश्री जी ने जैन तत्त्वदर्शन के साध्वी व समणियों के प्रशिक्षण के संदर्भ में जानकारी दी।
तत्पश्चात् युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन संबोध प्रदान करते हुए फरमाया कि योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में त्रिदिवसीय अनुष्ठान कार्यक्रम का अनुक्रम चल रहा है जिसका आज तीसरा दिन है। योगक्षेम वर्ष के अन्तर्गत सुनना भी एक अच्छा कार्य है। प्रशिक्षक की बात सुनें, प्रवचन सुनें और अन्य कोई प्रेरणादायक बात हो तो उसे सुनें।
इस प्रकार श्रुति भी योगक्षेम वर्ष का मानो विशेष कार्य है। श्रोतेन्द्रिय का बहुत महत्त्व है, जो प्राणी सुनने वाला होता है वही जीव पंचेन्द्रिय प्राणी होता हे। श्रोत्र हमें प्राप्त है और सुनने से हमें अनेक जानकारियां मिल सकती है। साधु-साध्वियों द्वारा दिया जाने वाला आध्यात्मिक प्रवचन एक पवित्र कार्य है। यह पुनीत आर्षवाणी जब कानों द्वारा सुनी जाती है तो मानों कान धन्य हो जाते हैं। साधु त्यागी हों और साथ में ज्ञानी भी हो तो बहुत अच्छी बात होती है।
चारित्रात्माओं के मुख से आगमवाणी का श्रवण करने का अवसर मिले तो वह सौभाग्य की बात होती है। साधु-साध्वियों, समणियों और गृहस्थों को बहुश्रुत होना एक बात है और बहुश्रुत होने के साथ-साथ यदि प्रस्तुति की कला भी अच्छी हो जाए तो उसके साथ अच्छी उपलब्धि जुड़ जाती है। कई ऐसे भी होते हैं जिनके पास ज्ञान तो बहुत होता है परन्तु प्रस्तुति ठीक प्रकार नहीं हो पाती।
योगक्षेम वर्ष के अन्तर्गत भाषण, वक्तव्य आदि के प्रशिक्षण का भी उपक्रम रखा जा सकता है। परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के प्रवचन की भाषा स्पष्ट व शुद्ध होती थी और साथ में वैदुष्य भी था। अतः वक्तव्य कला के विकास हेतु पूर्वाचार्यों की वाणियों से भी प्रेरणा ली जा सकती है। हमारे कान दो हैं और मुख एक है। इसलिए व्यक्ति को सुनना ज्यादा चाहिए और कम से कम बोलने का प्रयास करना चाहिए।
सुनकर व्यक्ति पाप को भी जान लेता है और कल्याण को भी जान लेता है, उसमें जो भी श्रेयस्कर हो उसका समाचरण करने का प्रयास करना चाहिए। किसी दुःखी व्यक्ति के दुःख को धैर्य से सुन लें, उसका समाधान दे पाएं या नहीं, उसकी तकलीफों को सुनने मात्र से भी उसे कुछ शांति मिल सकती है। सुनने से कितनी-कितनी प्रेरणा मिल सकती है। आचार्यश्री तुलसी प्रवचन किया करते थे और प्रवचन के बीच में गीत का संगान भी करते थे। उन्होंने अपने प्रवचनों से कितना-कितना ज्ञान प्रदान किया था। जहां भी ज्ञान की बातें हों और अच्छी जानकारी हो उसे ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। शुद्ध भाषा बोलना, व्याकरण का उच्चारण भी अच्छा होता है तो सुनने वाले को भी अच्छा ज्ञान प्राप्त हो सकता है।
पूज्य गुरुदेव के प्रवचन के पश्चात् साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशाजी ने तत्त्वज्ञान के संदर्भ में जानकारी दी। पूज्य प्रवर ने योगक्षेम वर्ष में चलने वाले नियमित कार्यक्रमों से संबंधित कुछ नियमों आदि के संदर्भ में जानकारी दी। आचार्य प्रवर ने तत्त्वज्ञान और प्रेक्षा ध्यान की कक्षा कल से ही प्रारंभ करने की प्रेरणा दी।