गुरुवाणी/ केन्द्र
सम्यक् ज्ञान और दर्शन के होने से होता है सम्यक् चारित्र : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। तदुपरांत साध्वी वृंद ने गीत का संगान किया। समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आर्हत् वाङ्मय के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि पांच शब्द हैं - गंता, गंतव्य, गति, मार्ग और मार्गदर्शक। जो गति करता है, वह गंता होता है। जहां पहुँचना है अर्थात् जो हमारी मंजिल या लक्ष्य है वह गंतव्य होता है। गंता और गंतव्य के मिलन के लिए गंता को गति करनी होगी। गंतव्य तक गति करने के लिए मार्ग की आवश्यकता होती है। प्रश्न है कि गंता, गति किधर करे? किस मार्ग पर करे, इसके लिए मार्गदर्शक की अपेक्षा होती है। अतः गंता, गंतव्य, गति, मार्ग और मार्गदर्शक ये पांच चीजें होती है तो कोई गंता गंतव्य तक पहुंच सकता है।
अध्यात्म के संदर्भ में साधना करने वाला व्यक्ति गंता होता है। गंतव्य मोक्ष होता है। साधना, आराधना करना गति हो जाता है। प्रश्न है कि गति कहां करें? आगम में कहा गया - ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के मार्ग पर गति करें इनकी आराधना करें। अतः ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप रूपी चतुरंगीण मार्ग होता है। मार्ग पर चलने के लिए एक मार्गदर्शक चाहिए तो हमारे तीर्थंकर गुरू मार्गदर्शक हो जाते हैं।
मोक्ष प्राप्ति के लिए सम्यक्त्व का भी बहुत महत्त्व है। सम्यक् दर्शन के बिना सम्यक् ज्ञान नहीं होगा और सम्यक् ज्ञान के बिना सम्यक् चारित्र का गुण नहीं आएगा और सम्यक् चारित्र के बिना निर्वाण अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। इस संदर्भ में सम्यक्त्व का महत्व परिलक्षित हो रहा है। यद्यपि जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ में आगमिक आधार पर मिथ्यात्वी की करणी को भी मोक्ष की देश आराधिका माना गया है परन्तु उसका थोड़ा ही लाभ माना जा सकता है। सम्यक्त्व युक्त क्रिया का लाभ मिथ्यात्वी की क्रिया की तुलना में बहुत अधिक होता है। अतः सम्यक्त्व रत्न से बड़ा कोई रत्न नहीं, सम्यक्त्व रूपी भाई से बड़ा कोई भाई नहीं। सम्यक्त्व स्वतंत्र हो सकता है, परन्तु चारित्र सम्यक्त्व के बिना नहीं हो सकता है।
पूज्य प्रवर ने कहा कि योगक्षेम वर्ष के दौरान जो प्राप्त नहीं है, उसे प्राप्त करने का अच्छा मौका है। योगक्षेम वर्ष में चिंतन-मंथन के संदर्भ में आचार्य श्री ने साधु-साध्वियां, समणियों के समक्ष सम्यक्त्व और चौथे गुणस्थान में औपशमिक सम्यक्त्व संबंधी चिंतन हेतु विषय रखे। तत्पश्चात् एक जिज्ञासा का अवसर प्रदान किया तो साध्वीश्री ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत की तथा आचार्य प्रवर ने समाधान प्रदान किया।
लाडनूं में ही स्थित साध्वी सेवा मंदिर में दिनांक 20.02.2026 को साध्वी श्री सूरजकुमारीजी का देवलोक गमन हो गया था। इस संदर्भ में आज उनकी स्मृति सभा का आयोजन हुआ जिसमें आचार्यश्री ने साध्वी श्री सूरजकुमारीजी का संक्षिप्त परिचय प्रदान किया तथा उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगल कामना की। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी, साध्वी वर्या श्री संबुद्धयशा जी ने भी दिवंगत साध्वीश्री जी की आत्मा के आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण की मंगलकामना की।