श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

भगवान ने कहा- 'आनन्द ने जो कहा है, वह जागरण के क्षण में कहा है। वह सही है। उसे प्रायश्चित्त करने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रमाद तुमने किया है। तुमने जो कहा, वह सही नहीं है, इसलिए तुम ही प्रायश्चित्त करो। आनन्द के पास जाओ, उसकी सत्यता को समर्थन दो और क्षमायाचना करो।'
गौतम तत्काल आनन्द के उपासना-गृह में पहुंचे। भगवान के प्रधान शिष्य का आनन्द के पास जाना, उसके ज्ञान का समर्थन करना, अपने प्रमाद का प्रायश्चित्त करना और क्षमा मांगना व्यक्ति-निर्माण की दिशा में कितना अद्भुत प्रयोग है।'
भगवान जानते थे कि असत्य के समर्थन से गौतम की प्रतिष्ठा सुरक्षित नहीं रह सकती। सत्यवादी आनन्द को झुठलाकर यदि गौतम की प्रतिष्ठा को बचाने का यत्न किया जाता तो गौतम का अहं अमर हो जाता, उनकी आत्मा मर जाती। आत्मा का हनन भगवान को क्षण भर के लिए भी इष्ट नहीं था। फिर वे क्या करते-गौतम की आत्मा को बचाते या उनके अहं को?
महावीर के धर्म का पहला पाठ है-जागरण और अंतिम पाठ है-जागरण। बीच का कोई भी पाठ जागरण की भाषा से शून्य नहीं है। जहां मूर्च्छा आई वहां महावीर का धर्म विदा हो गया। मूर्च्छा और उनका धर्म-दोनों एक साथ नहीं चल सकते।
महाशतक उपासना-गृह में धर्म की आराधना कर रहा था। उसकी पत्नी रेवती बहुत निर्दय थी। उसने महाशतक को विचलित करने का प्रयत्न किया। उसकी ध्यान-धारा विच्छिन्न नहीं हुई। उसका साधना क्रम अविचल रहा। कुछ दिन बाद रेवती ने फिर वैसा प्रयत्न किया। इस बार महाशतक कुद्ध हो गया। उसने रेवती की भर्त्सना की। क्रोध के आवेश में कहा- 'रेवती! तुम इसी सप्ताह विशूचिका से पीड़ित होकर मर जाओगी। मृत्यु के पश्चात् तुम नरक में जन्म लोगी।'
रेवती भयभीत हो गई। वह रोग, मृत्यु और नरक का नाम सुन घबरा गई। शब्द-संसार में ये तीनों शब्द सर्वाधिक अप्रिय हैं। महाशतक ने एक साथ इन तीनों का प्रयोग कर दिया। वह सप्ताह पूरा होते-होते मर गई।
भगवान महावीर राजगृह आए। भगवान ने गौतम से कहा- 'उपासक महाशतक ने अपनी पत्नी के लिए अप्रिय शब्दों का प्रयोग किया है। तुम जाओ और उससे कहो-समत्व की साधना में तन्मय उपासक के लिए अप्रिय शब्दों का प्रयोग करना उचित नहीं है। इसलिए तुम उसका प्रायश्चित्त करो।'
गौतम महाशतक के पास गए। भगवान का संदेश उसे बताया। उसे अपने प्रमाद का अनुभव हुआ। उसने प्रायश्चित्त किया। अप्रमाद की ज्योति फिर प्रज्वलित हो गई।
आत्मा की विस्मृति के क्षण दुर्घटना के क्षण होते हैं। मानवीय जीवन में जितनी दुर्घटनाएं घटित होती हैं, वे सब इन्हीं क्षणों में होती हैं।
एक बार सम्राट् श्रेणिक का अन्तःपुर अविश्वास की आग से धधक उठा। सम्राट् को महारानी चेलना के चरित्र पर सन्देह हो गया। उसने क्रोध में अभिभूत होकर अभयकुमार को अन्तःपुर जलाने का आदेश दे दिया। सम्राट् निर्मम आदेश देकर भगवान महावीर के समवसरण में चला गया।
भगवान ने उसके प्रमाद को देखा। भगवान ने परिषद् के बीच कहा- 'संदेह बहुत बड़ा आवर्त्त है। उसमें फंसने वाली कोई भी नौका सुरक्षित नहीं रह पाती। आज श्रेणिक की नौका संदेह के आवर्त्त में फंस गई है। उसे चेलना के सतीत्व पर संदेह हो गया है। मैं देखता हूं कि कितना निर्मल, कितना अवदात और कितना उज्ज्वल चरित्र है चेलना का। फिर भी सन्देह का राहु उसे ग्रसने का प्रयास कर रहा है।'
सम्राट् की निद्रा भंग हो गई। आखें खुल गई। उसे अपने प्रमाद पर अनुताप हुआ। वह तत्काल राज-प्रासाद पहुंचा। अन्तःपुर का वैश्वानर अप्रमाद के जल से शांत हो गया। सम्राट् धन्य हो गया।
आत्मा की स्मृति के क्षण जीवन की सार्थकता के क्षण होते हैं। मानवीय जीवन में जितनी सार्थकताएं निष्पन्न होती हैं, वे सब इन्हीं क्षणों में होती हैं।