अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थिति में  समता भाव रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 14 मार्च, 2026

अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थिति में समता भाव रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के विषय: 'प्रिय-अप्रिय को धारण करें' पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से मंगल देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि आदमी के जीवन में कभी अनुकूलता पूर्ण स्थिति आ जाती है तो कभी अप्रिय यानी प्रतिकूलता पूर्ण स्थिति भी सामने आ सकती है। कर्मवाद के सिद्धान्त के अनुसार पूर्वकृत कर्मों का फल भोगना होता है अतः कई बार अनुकूल और कई बार प्रतिकूल संवेदन उत्पन्न हो सकते हैं। जीवन में आरोह-अवरोह की स्थिति आ सकती है। गृहस्थों में भी कभी आदमी उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ता है। आर्थिक संपन्नता, समाज में प्रतिष्ठा, राजनीति में वर्चस्व की स्थिति प्राप्त होती है। कई बार आदमी के जीवन में अपकर्ष का समय भी आ सकता है। आर्थिक विपन्नता की स्थिति में अन्य अनुकूलताएं भी नहीं रहती है। अतः जीवन का एक भाग उत्कर्ष व दूसरा भाग अपकर्ष वाला भी हो सकता है। इन दोनों स्थितियों को धारण कर लेना चाहिए। समभाव रखना चाहिए। हर समय में समता का भाव रहे।
अनुकूलता की स्थिति सामने आने पर अति आनंद होता है तो विपरीत स्थिति आने पर कष्ट भी हो सकता है। इसलिए दोनों स्थितियों में समभाव रखना चाहिए। साधु जीवन में भी बाह्य संदर्भों में उत्कर्ष और अपकर्ष के दिन आ सकते हैं। कर्मों के योग से प्रतिकूलता की स्थिति भी बन सकती है। ऐसी स्थिति में भी समता भाव रहना चाहिए। बड़ों के प्रति अविनय का भाव नहीं आना चाहिए। दुनिया का कितना भी बड़ा आदमी हो कर्म किसी को छोड़ते नहीं है। चक्रवर्ती सनतकुमार जैसे बड़े आदमी को भी कर्माें का फल भोगना ही पड़ा था। ऐसी स्थिति में भी समता का भाव रहना चाहिए। साधु के भी बीमारी हो जाए या लोंच आदि में तकलीफ हो तो समता से यह सोचकर सहन करना चाहिए कि इससे हमारे कर्मों की निर्जरा हो रही है। घाती और अघाती दोनों प्रकार के कर्म अपना प्रभाव दिखाते हैं। मन में उद्वेलन नहीं होना चाहिए, प्रिय-अप्रिय को धारण करें, कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। राग-द्वेष मुक्त रहकर समता की साधना करनी चाहिए। साधु जीवन हो या गृहस्थ का जीवन दोनों में ही प्रियता और अप्रियता की स्थितियां आ सकती है, ऐसे में समता रखनी चाहिए।
नेत्तृत्व और टीम प्रबंधन का सूत्र देते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि विदाउट टीम-नो स्कीम! बिना टीम के कोई योजना सफल नहीं हो सकती। एक मुखिया के पास सशक्त टीम होनी चाहिए और उसे सफलता का श्रेय खुद लेने व गलती का ठीकरा टीम पर ढोलने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। सफलता व विफलता दोनों में टीम को अपना अंग मानकर साथ लेकर चलना चाहिए। हमारी साधना भी इस प्रकार की होनी चाहिए कि कोई प्रशंसा करे या अवहेलना, हमें समता भाव रखते हुए अपने प्रिय और अप्रिय को सहन करने की क्षमता को पुष्ट करना चाहिए।