गुरुवाणी/ केन्द्र
मन का दमन और इन्द्रियों के शमन से प्राप्त किया जा सकता है सुख : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आर्हत् वाङ्मय के माध्यम से अपनी अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि आज का विषय है- “सुखी कौन बनता है?” आदमी या प्राणी के मन में सुखेच्छा होती है कि मैं सुखी रहूं। आदमी या प्राणी दुःख से डरता है। प्रश्न है कि दुःख पैदा किसने किया? तो भगवान ने कहा- स्वयं जीव ने ही दुःख पैदा किया है। आदमी या प्राणी दुःख से डरते हैं कि कोई कष्ट न हो। अपमान, चोरी, मृत्यु, बीमारी आदि के भय से आदमी दुःखी हो जाता है। कभी आदमी को छोटे प्राणी से भी भय लग सकता है। प्राणी के भीतर भय आदि वृत्तियां होती है और कभी-कभी पूर्व जन्म के संस्कारों से भी डर लग सकता है। यदि भय नहीं रहे तो आदमी कितना सुखी बन जाए? बाह्य सुख भी अभीष्ट होता है और साधक भीतर का सुख-आध्यत्मिक सुख भी पाना चाहते हैं।
पदार्थ जन्म और परिस्थिति जन्म सुख, उस पदार्थ के वियोग और परिस्थिति के चले जाने पर आदमी दुःखी बन जाता है। सुखी कैसे बना जा सकता है? इस हेतु शास्त्रकार ने मार्गदर्शन देते हुए कहा है कि आत्मा का दमन करना चाहिए। प्रश्न है- आत्मा का दमन कैसे करें? यदि अपने आप का दमन करना है तो मन का दमन और इन्द्रियों का शमन अर्थात् निग्रह करना चाहिए। यदि मन का नियंत्रण हो जाए इन्द्रियों का संयम हो जाए तो हमारी आत्मा का दमन हो सकेगा। आत्मानुशासन हो सकेगा। यदि हम आत्म दमन के तरीके पर विचार करें तो आत्म दमन हमारा साध्य है। शास्त्रकार ने इस साध्य की प्राप्ति के दो साधन बताए हैं- संयम और तप।
यदि संयम की साधना करें और तपस्या करें तो आत्म दमन हो सकेगा। बंधन से कोई अनुशासन करे यह अच्छा नहीं है, स्वयं पर अनुशासन करना चाहिए। धर्मसंघ के संदर्भ में अनुशासन एक अपेक्षा से बंधन प्रतीत हो सकता है परन्तु वह बंधन भी कभी आगे बढ़ाने वाला बन सकता है। कोई गृहस्थ स्वतंत्रतापूर्वक पैदल कहीं जाना चाहे तो उसे ज्यादा समय लगेगा और उसी शहर की ट्रेन से या अन्य किसी साधन का प्रयोग करके यात्रा करता है तो वह बहुत कम समय में पहुंच सकता है। यहां ट्रेन आदि एक सीमा में बंधन है परन्तु इससे आदमी अपनी मंजिल बहुत शीघ्रता से प्राप्त कर सकता है। यदि हमारे अंदर अच्छा आत्मानुशासन जाग जाए तो धर्म संघ का अनुशासन भी कमजोर पड़ सकता है। फिर गुरु को अधिक कहने की आवश्यकता ही नहीं होगी। अतः शास्त्र में कहा गया कि आत्मा का दमन करो, आत्मानुशासन करो क्योंकि आत्मा का दमन करने वाला सुखी बनता है।