सम्मान देना–अर्थ दान से भी बड़ा दान है : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 16 मार्च, 2026

सम्मान देना–अर्थ दान से भी बड़ा दान है : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के विषय - “संभाषण की कला” पर उत्तरज्झयणाणि आगम के आधार पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि हमारे जीवन के व्यवहार को चलाने के लिए शब्दों का प्रयोग यदा-कदा करना होता है। दिन भर में हम अनेक शब्द काम में ले लेते हैं। यदि गहराई से ध्यान दें तो जानेंगे कि दिन भर में आवश्यक कितना बोले और अनावश्यक कितना! एक दृष्टि से बोलना कोई बड़ी बात नहीं है और नहीं बोलना भी कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है बोलने और न बोलने का विवेक रखना। इसी प्रकार भोजन करना कोई बड़ी बात नहीं, न करना भी कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है खाने और न खाने का विवेक रखना। अपने बल, श्रद्धा, आरोग्य, क्षेत्र, काल आदि अनेक संदर्भों में आदमी विवेक कर ले कि यह काम करणीय है या अकरणीय। यदि स्वयं में इतना विवेक न हो तो दूसरों से या गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। आवश्यकतानुसार यथानुकूलता विशेषज्ञों का परामर्श लेने से सफलता अच्छी प्राप्त हो सकती है।
कहीं मौन अच्छा होता है तो कहीं बोलना भी अच्छा होता है। तीर्थंकर भगवान चार घाती कर्मों के क्षय करने के बाद भी देशना देते हैं वे मौन लेकर बैठ जाते, क्योंकि उनका बोलना जीवों के उद्धार और अनुकंपा के लिए होता है। बोलना भी परोपकार का काम होता है बस हमारा विवेक ठीक रहे कि कहां बोलना है और कहां मौन रखना है। शास्त्र में साधु के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया गया है कि कोई पूछे तो भी सावद्य भाषा नहीं बोलनी चाहिए, कटु भाषा नहीं बोलनी चाहिए। गृहस्थोचित बातों से साधु को मुक्त रहना चाहिए। इन बातों से साधु जीवन में मलिनता भी आ सकती है।
साधु को अर्थहीन और मर्मभेदी भाषा से बचना चाहिए। मर्म भेदी भाषा वह है जिससे कोई व्यक्ति इतना लज्जित और कुंठित हो जाए कि वह आत्महत्या तक कर ले। अतः हमारी भाषा में सभ्यता और शिष्टता रहनी चाहिए। हम किसके साथ कैसी भाषा का प्रयोग करते हैं यह विवेक होना चाहिए। बातचीत और भाषण प्रवचन को भी अच्छी कला होनी चाहिए। भाषा में प्रामाणिकता रहनी चाहिए। भाषा का प्रयोग हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है।
वाणी में अमृत भी हो सकता है और विष भी हो सकता है। अर्थ या धन का दान देने से बड़ा दान सम्मान देना है। इसलिए हमारी भाषा ऐसी शिष्ट और प्रामाणिक होनी चाहिए जिससे दूसरों का अपमान न हो। न अपने लिए, न दूसरों के लिए और न ही बिना किसी प्रयोजन के हमें सावद्य, निरर्थक या मर्म भेदी भाषा का प्रयोग करना चाहिए। मुख्य प्रवचन और जिज्ञासा समाधान के क्रम के पश्चात् जैन विश्व भारती द्वारा मानवीय मूल्यों और साहित्य को समर्पित आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार (2024) साहित्यकार और कवि राजेश चेतन को प्रदान किया गया। यह पुरस्कार “सूरजमल सुराणा चैरिटेबल ट्रस्ट” गुवाहाटी के सौजन्य से दिया गया । राजेश चेतन ने गुरुदेव के प्रति अपनी कृतज्ञता पूर्ण अभिव्यक्ति दी।