गुस्सा आने पर उसे विफल करने का प्रयास रहे :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 13 मार्च, 2026

गुस्सा आने पर उसे विफल करने का प्रयास रहे :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं की पावन धरा पर स्थित जैन विश्व भारती के सुधर्मा सभा में आज के विषय - ‘विफल करें क्रोध को’ पर अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि हमारे जीवन में भावों का उतार चढ़ाव भी हो सकता है। चित्त के कैनवास पर कभी अहंकार का दृश्य उभरता है, कभी गुस्से का, कभी दूसरे को वंचित करने का भाव आ जाता है, कभी तृष्णा अपना रूप दिखाती है। इसके साथ कभी क्षमा, शांति का भाव, कभी मार्दव, ऋजुता, कभी संतोष का भाव उभरता है। चौबीस घंटों में भावों के अनेक रूप उभर सकते हैं। कई व्यक्ति इतने शांत रहते हैं कि चौबीस घंटों में भी उन्हें क्रोध नहीं आता। कईयों की इतनी सहज साधना रहती है कि स्वभाव काफी शांत रहता है।
हम व्यवहार की दुनिया में समूह में रह रहे हैं और समूह में रहने पर कुछ समस्याएं भी पैदा हो सकती है। आचार्य हेमचन्द्र ने पशुओं के समूह को ‘समज’ और मनुष्यों के समूह को ‘समाज’ कहा है। हम समाज में रहते हैं अतः हमारी साधना पद्धति संघबद्ध है। यद्यपि प्राचीन काल में एकाकी साधना भी होती थी। संघबद्ध रहने से समस्याएं भी आ सकती है। एक समूह के किसी व्यक्ति के व्यवहार से कभी झुझलाहट भी आ सकती है। व्यवस्थित काम नहीं होने पर भी कभी अप्रियता के भाव आ सकते हैं। इस प्रकार अनेक स्थितियों में मन में गुस्से, झुंझलाहट, अप्रीति का भाव पैदा हो सकता है। साधना बड़ी यह है कि मन में कभी गुस्सा आए ही नहीं। ऐसे भी अनेक व्यक्ति होते हैं जो प्रायः शान्त रहते हैं। समूह में जिम्मेदार व्यक्ति को कभी अंगुली निर्देश भी करना पड़ता है, न कहे तो भी कठिनाई हो सकती है और गुस्सा करे तो मन में यह भी आ सकता है कि मेरी आत्मा के कर्म बंधन होता है। ऐसी संकरी गली में से निकलने के लिए यह प्रयास हो कि भीतर में आवेश नहीं आए। आवेश आना दुर्बलता हो सकती है पर तेज गुस्सा आना, वस्तुएं आदि फेंक देना, यह काम का नहीं है। कभी गलतियों के सुधार के लिए कुछ कहना भी ठीक है क्यों कि जागरूक व्यवहार के लिए यह आवश्यक होता है। बड़े कोई शिक्षा दें तो छोटों को उसे अप्रिय नहीं मानना चाहिए, विनय पूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
कभी गुस्सा आ जाए तो उसे विफल करने का प्रयास करना चाहिए। आगम में गुस्से का कारण क्रोध कषाय का उदय बताया गया है, साथ में यदि निमित्त भी हो। मन, वचन, शरीर में भी यदि गुस्सा प्रकट हो जाए तो ऐसी स्थिति में हमें क्रोध को विफल करें, असत्य करें। यहां असत्य करने का अर्थ है - अस्तित्वहीन करना, सत्ताच्युत कर देना। क्रोध को योग रूप में नहीं आने दें। क्रोध की स्थिति में शांति में प्रेक्षा करें, दीर्घ श्वास, आदि का प्रयोग करना चाहिए। ‘उवसमेण हणे कोहं’ का जप करना चाहिए। मन का गुस्सा, शब्दों में, चेहरे पर अभिव्यक्त न हो, यह प्रयास करना चाहिए। इसके लिए प्रेक्षा ध्यान का भी प्रयोग किया जा सकता है। ज्ञान होने पर भी मौन रखना, शक्ति होने पर भी क्षमा रखना, दान देकर भी नाम की आकांक्षा न रखना, यह बहुत बड़ी बात है। मंगल प्रवचन के उपरान्त परम पूज्य गुरुदेव ने एक सप्ताह पूर्व दीक्षित साध्वियों को छेदोपस्थापनीय चारित्र प्रदान करवाया।