संपादकीय
विश्व मित्र भगवान महावीर
इस दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेता है और मृत्यु का वरण करता है. जन्म और मृत्यु ये दो बिन्दु हैं. इन दो बिन्दुओं को जोड़नेवाली रेखा को हम जीवन कहते हैं. जीवन सभी जीते हैं लेकिन कुछ विरल व्यक्ति होते हैं जिनका जीवन दूसरों के लिए प्रकाश-स्तम्भ बन जाता है. वे अपने जीवन को तो सार्थकता के शिखर पर पहुंचा ही देते हैं लेकिन अन्यान्य हजारों-लाखों व्यक्तियों के चरणों को भी सार्थकता के राजपथ पर गतिशील कर देते हैं. ऐसे विरल महापुरुषों की विलक्षण सूची में जिनका नाम स्वर्णाक्षरों से अंकित हो गया है वे हैं: विश्व मित्र भगवान महावीर.
आत्म विजयी महापुरुष :
भगवान महावीर राजघराने में अवतरित हुए. उनका मूल नाम था वर्धमान. राजा-महाराजा वे होते हैं जो दूसरों पर अपना आधिपत्य जमाते हैं. दूसरों पर विजय प्राप्त करते हैं. वर्धमान महाराजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला के सुपुत्र थे. राजवैभव उनके चरणों में था. उनके पास शरीरबल, शस्त्रबल, सैन्यबल, धनबल सबकुछ प्रचुर मात्रा में था लेकिन उन्होंने अपने बल का उपयोग कभी दूसरों पर आधिपत्य जमाने में नहीं किया. दूसरों पर विजय प्राप्त करने में नहीं किया. उन्होंने अपनी अपरिमित शक्ति का उपयोग अपनी आत्मा पर आधिपत्य स्थापित करने में किया. उन्होंने अपने बल का उपयोग आत्मविजय प्राप्त करने में किया. उन्होंने कहा -
जो सहस्सं, सहस्साणं, संगामे दुज्जए जिणे।
एगं जिणेज्ज अप्पाणं, एस से परमो जओ।।
परम विजेता वह नहीं है जो युद्ध के रणसंग्राम में दस हजार योद्धाओं पर विजय प्राप्त कर ले. परम विजेता तो वह होता है, जो अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है. अपने आप पर विजय प्राप्त करने का तात्पर्य है-अपने आपको पहचानना - अपनी आत्मा को पहचानना. अपने आपको पहचानने का - आत्म विजयी बनने का मतलब है-अपने कषायों-क्रोध, मान, माया, लोभ आदि को परास्त करना अपने भीतर के दुर्गुणों को दूर करना, दुष्प्रवृत्तियों से निवृत्त होना और सत्प्रवृत्तियों में प्रवृत्त होना. राग-द्वेष से मुक्त होना। आज सबसे मुश्किल कार्य है अपनी वृत्तियों पर नियंत्रण पाना. हमारे भीतर राग और द्वेष भरे पड़े हैं. हम हमारे आवेग और संवेग पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं हम बात-बात में गुस्सा कर लेते हैं. क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं. अहंकार और ममकार के कारागार में हम कैद हो गए हैं. किसी को धन का अहंकार है, किसी को ज्ञान का अहंकार है, किसी को सत्ता का अहंकार है. किसी को अपने रूप का अहंकार है. भगवान ने समस्त राजवैभव का त्याग कर दिया, ऐश्वर्य का त्याग कर दिया. अपने शरीर के प्रति ममत्व का भी त्याग कर दिया. लेकिन हमारे लिए ममत्व का विसर्जन करना आकाश कुसुमवत् है. भगवान महावीर की साढ़े बारह वर्ष की साधना अहंकार और ममकार के विसर्जन की साधना थी. अहंकार और ममकार दोनों हमारे महान शत्रु हैं. इन दोनों शत्रुओं से संपूर्ण निजात पाकर महावीर अजातशत्रु बन गए. आत्म विजयी बन गए.
सत्य के अन्वेषक :
भगवान महावीर सत्य के अन्वेषक थे. सत्य का एक अर्थ है आत्मा. सत्य को पहचानने का मतलब है आत्मा को पहचानना. आत्मा के शुद्ध स्वरूप को जानना. आत्मा के शुद्ध स्वरूप को वही पहचान सकता है जो सम्यग्दर्शी
होता है. सम्यकदर्शी वह होता है जो पूर्वग्रहों से मुक्त होता है. सम्यकदर्शी वह होता है जो वस्तु को वो जिस रूप में है उसी रूप में देखता है. राग और द्वेष से मुक्त होकर देखता है. हम पास्परिक संबंधों का जीवन जीते हैं. हमारा दृष्टिकोण किसी के प्रति रागात्मक होता है तो किसी के प्रति द्वेषात्मक होता है. एक व्यक्ति को हम अच्छा बताते हैं, उसी व्यक्ति को कोई बुरा भी बताता है. व्यक्ति के प्रति हमारा दृष्टिकोण प्रायः गलत होता है. व्यक्ति के प्रति हमारा दृष्टिकोण रागात्मक होता है तब हम व्यक्ति को अच्छा बताते हैं. व्यक्ति के प्रति हमारा दृष्टिकोण द्वेषात्मक होता है तब हम व्यक्ति को बुरा बताते हैं. जब तक हमारे भीतर राग और द्वेष के भाव हैं तब तक हम सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकते. भगवान महावीर ने कहा-
पुरिसा सच्चमेव, समभिजाणाहि।
सच्चं भयवं, सच्चं लोयम्मि सारभूयं।।
पुरुष तू सत्य का ही अनुचिन्तन कर. सत्य का ही अनुशीलन कर क्यों कि सत्य ही भगवान है. सत्य ही इस लोक में सारभूत तत्व है. प्रश्न होता है कि यह सत्य है क्या? मेरी बुद्धि में यह सत्य है - सम्यक् दर्शन. जहां राग है वहां सत्य ठहर नहीं सकता. जहां द्वेष है वहां भी सत्य अवस्थित नहीं हो सकता. सत्य वहां अवस्थित हो सकता है जहां सम्यकदर्शन है. न राग है, न द्वेष है. भगवान राग-द्वेष विजेता बने और आत्मविजयी बन गए. केवलज्ञानी बन गए. तीनों लोक के ज्ञाता बन गए. उन्होंने संपूर्ण सत्य का साक्षात्कार कर लिया।
धर्म क्रान्ति के प्रणेता :
भगवान महावीर ने धर्म के क्षेत्र में अद्भुत क्रान्ति का सूत्रपात किया. ढाई हजार वर्ष पूर्व धर्म के क्षेत्र में अनेक भ्रान्तियां थी. धार्मिक क्रियाओं में पशु बलि और नरबलि चढ़ाई जाती थी. भगवान महावीर नए धार्मिक क्षेत्र में प्रचलित भ्रान्तियों को नेस्तनाबूद करने के लिए क्रान्ति की मशाल उठाई. उन्होंने धर्म का शुद्ध स्वरूप लोगों के सामने रखा. उन्होंने कहा -
सव्वे पाणा ण हन्तव्वा।
एस धम्मे धुवे, णिइए सासए।।
इस जगत् में सभी प्राणी जीना चाहते हैं. अत: कोई भी प्राणी वध्य नहीं है. किसीका वध मत करो, किसी को कष्ट मत दो किसीको बाधा मत पहुंचाओ . यही अहिंसा है. और यही धर्म है. धर्म का शुद्ध स्वरूप प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा -
धम्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसंति, जस्स धम्मे सयामणुओ
धर्म उत्कृष्ट मंगल है. लेकिन कौन-सा धर्म ? वह धर्म जिसमें अहिंसा है, संयम है और तप है. जहां प्राणी मात्र के प्रति आत्मौपम्य भाव है, हिंसा नहीं है. जहां जीव मात्र के प्रति संयम है- करुणा है, और जहां तप है वहां ही शुद्ध धर्म है. आज प्रत्येक आस्तिक व्यक्ति अपने आपको धार्मिक मानता है. कोई मंदिर में जाता है, कोई मस्जिद में जाता है, कोई गुरुद्वारा में जाता है. कोई तिलक करता है, कोई यज्ञ में आहुति देता है, कोई प्रभु-चरणों में नैवेद्य धरता है, भगवान की मूरत के चरणों में शीष नमाता है और अपने आपको धार्मिक मान लेता है. व्यक्ति धर्मस्थान में तो अच्छा आचरण करता है लेकिन बाहर आकर बुरा व्यवहार करता है. अपने व्यवसाय में ईमानदारी नहीं रखता है ग्राहकों के साथ धोखा करता है तो फिर धर्म वहां कैसे रुकेगा ? भगवान ने कहा -
'पढमं नाणं तओ दया'
पहले ज्ञान और फिर आचरण यदि ज्ञान ही नहीं है तो आचरण किस बात का? ज्ञान है लेकिन उसका जीवन में आचरण नहीं है तो उस ज्ञान का मूल्य ही क्या?भगवान महावीर ने कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन किया उन्होंने कहा जो भी कम संचित किए हैं उनका फल देर समीर भोगना ही पड़ेगा उन्होंने कर्मों के बंधन से मुक्ति के लिए 12 प्रकार के मार्ग बताएं जिससे हम निर्जरा के बारे में भेज करते हैं फंक्शन चौधरी भिक्षाचारी स्वाध्याय ज्ञान का उपसर्ग आदि 12 प्रकार के तब द्वारा व्यक्ति अपने कर्मों की निर्जला कर सकता है और भाव भ्रमण की जंजाल से बच सकता है.
भगवान महावीर ने ऐसे विशुद्ध और वैज्ञानिक धर्म का प्रवर्तन किया जो सदियों बाद भी जन-जन के लिए अनुसरणीय और आचरणीय बना हुआ है. और सहस्त्राब्दियों तक भी आचरणीय बना रहेगा ऐसे वैज्ञानिक धर्म के उद्गाता को विश्व के प्रथम और प्रखर वैज्ञानिक की उपमा से उपमित करने में शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं है.
मिती मे सव्व भूएसु :
भगवान महावीर प्राणी मात्र के परम मित्र थे. संसार के समस्त जीवों के प्रति उनके हृदय से करुणा का अजस्र स्रोत प्रवाहित होता था. मैत्री वहां स्थापित होती है जहां करुणा की सरिता अस्खलित बहती रहती है. शूलपाणि यक्ष ने भगवान को मारणान्तिक कष्ट दिए लेकिन भगवान शांत रहे. चंडकौशिक दृष्टिविष धारक सर्प था. उसने भगवान के पैरों में डंक लगाए लेकिन भगवान के शरीर से दूध की धारा प्रवाहित हुई. भगवान के कान में कीले ठोके गए लेकिन भगवान शांत रहे. ग्वालों ने भगवान के पैरों में खीर पकाई तो भी भगवान अविचल रहे. उन्होंने दुश्मन को भी दोस्त समझा. संगमदेव ने बीस मारणान्तिक कष्ट दिए और पूछा कि महावीर तुम्हें मैं कैसा लग रहा हूं? तो भगवान ने कहा कि तुम मुझे बहुत अच्छे लग रहे हो क्यों कि तुमने मुझे कर्मों की निर्जरा शीघ्रता से करने का महान अवसर दिया. ऐसे महान करुणासागर, विश्व मित्र भगवान महावीर के सुपावन चरणों में कोटि-कोटि वंदन अभिनंदन ॥.
कार्यकारी संपादक की कलम से....