गुरुवाणी/ केन्द्र
विनीत और सक्षम शिष्य का हो सकता है विकास :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के विषय - 'गुरु के प्रति शिष्य की महानता' पर पावन संबोध प्रदान करते हुए फरमाया कि धर्म शासन में संगठन होता है। धर्म शासन में गुरु भी होते हैं और शिष्य भी होते हैं। गुरु और शिष्य दोनों अलग-अलग प्रकृति वाले हो सकते हैं। गुरु परंपरा में सारे गुरु एक समान प्रकृति, शैली, ज्ञान वाले हों यह आवश्यक नहीं है और शिष्य भी सभी एक समान प्रकृति व योग्यता संपन्न हो यह भी जरूरी नहीं है।
गुरु को महान होना चाहिए पर शिष्य भी यदि गुरु के प्रति महानता का परिचय दें तो यह अच्छी बात होती है। हमारे धर्म संघ में सामान्यतया गुरु और आचार्य दो अलग व्यक्ति नहीं है। गुरुओं में कोई गुरु तेज प्रकृति के हो सकते हैं तो कोई अत्यंत शांत स्वभाव के होते हैं। इसी प्रकार शिष्यों में भी भिन्नता होती है। कई शिष्य गुरु की आज्ञा व गुरु इंगित की आराधना नहीं करते हैं, आचार में भी कुशील होते हैं तो कुछ ऐसे शिष्य भी हो सकते हैं जो गुरु की इच्छा व चित्त के अनुरूप चलने वाले होते हैं, विनीत होते हैं और सूक्ष्म निपुणता से संपन्न होते हैं। गुरु के प्रति शिष्य की महानता यह है कि जो गुरु तेज प्रकृति और शैली वाले हों उनके भी चित्त में असमाधि न हो इस प्रकार का अपना आचरण और व्यवहार रखे। इतने जागरूक रहें कि गुरुदेव को कुछ कहने का मौका ही न मिले। अतः शिष्यों में विनयशीलता, गुरु की चित्त वृत्ति के अनुकूल चलना और जो भी कार्य मिले उसे निपुणता से संपन्न करने की प्रकृति होनी चाहिए।
कोई भी कार्य संपन्न करना एक बात होती है परन्तु कार्य को फूहड़पन से करने के बजाय सूक्ष्म निपुणता और चतुराई के साथ संपन्न करना चाहिए। कक्ष में पुस्तकें, कपड़े आदि व्यवस्थित रखने चाहिए। कपड़े सुखाते समय भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वायुकाय आदि जीवों की विराधना न हो, यह सब हमारी कार्यकुशलता है। आहार के समय भी यथासंभव मौन रखने का प्रयास करना चाहिए और अनावश्यक बोलने या जल्दबाजी करने से बचना चाहिए। प्रवचन के पश्चात् परम पूज्य गुरुदेव ने योगक्षेम वर्ष की संपन्नत के पश्चात् लाडनूं से दिल्ली तक वर्ष 2027 का संभावित यात्रा पथ घोषित किया।