गुरुवाणी/ केन्द्र
विनीतता और सक्षमता होने से सफलता प्राप्त हो सकती है :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने योगक्षेम वर्ष के अन्तर्गत प्रवचन श्रंखला में आज के विषय ‘गुरुदृष्टि के प्रति सजगता’ विषय पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि दुनिया में अनेक प्रकार के प्राणी जैसे मनुष्य, पशु-पक्षी, आदि होते हैं। अदृश्य प्रायः दुनिया में देव जगत भी है और ज्यादा अदृश्य जगत में नरक जगत भी है। इन प्राणियों की अपनी वृत्तियां भी होती है। स्थावर, अविकसित प्राणियों की वृत्तियां इतनी ज्यादा प्रत्यक्ष नहीं भी आती। स्थावर प्राणियों का तो जीवत्व भी कभी स्पष्ट हो जाता है। संज्ञी पंचेन्द्रिय प्राणियों जैसे पशु-पक्षी आदि की भी अपनी वृत्तियां होती है। ये पशु-पक्षी भी कभी अभय रह सकते हैं और कभी डर सकते हैं। जैन विश्व भारती परिसर में मयूर जाति के प्राणी अभय होकर परिवार के सदस्यों की तरह रहते हैं। हमारी ओर से भी यह प्रयास होना चाहिए कि इन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं हो।
उत्तराध्ययन सूत्र में दो प्रकार के घोड़े अविनीत और विनीत का दृष्टान्त आता है अविनीत या दुष्ट प्रकृति का घोड़ा बार बार चाबुक की इच्छा रखता है, जो बार बार चाबुक की इच्छा रखता है इस प्रकार साधु यह वृत्ति न रखे कि आचार्य मुझे बार बार कहे जाए। शिष्य को बार-बार गुरु के आदेश-उपदेश की इच्छा नहीं करनी चाहिए। दूसरा विनीत या आकीर्ण घोड़ा होता है, जो थोड़ा सा इशारा मिलते ही सही रास्ते पर चलने लगता है। इसी प्रकार विनीत शिष्य वह होता है जिसे एक बार बता दिया जाए तो अकरणीय छोड़कर करणी कार्य में लग जाता है। पारिवारिक जीवन हो या गुरु का सान्निध्य, हमें लापरवाह या उद्दंड नहीं बल्कि विनीत कोटि का व्यक्ति बनना चाहिए।
परम पूज्य गुरुदेव ने कहा कि विनीत और सक्षम शिष्य-शिष्याएं आचार्य या गुरु के लिए बहुत बड़ा सहारा होते हैं जिन्हें कोई कार्य सौंप दिया जाए तो वे उसे अपना भाग्य समझकर निष्ठा से पूरा करते हैं। संगठन या संघ में एक अच्छा तंत्र होता है तो कार्य भी सुगमता से होते हैं। हमारे धर्मसंघ में साध्वियों की संख्या, संतों से बहुत ज्यादा है, दोनों की अपनी-अपनी भूमिकाएं और महत्ता है। व्यक्ति को केवल विनीत ही नहीं, बल्कि साथ में सक्षम भी होना चाहिए, क्योंकि सक्षमता के बिना विनीत होने पर भी अभीष्ट कार्य पूरा नहीं हो सकता। विनीतता और सक्षमता दोनों हमारे में रहे, तो भीतर जीवन का अच्छा सफल्य हो सकता है।
प्रवचन के उपरांत प्रोफेसर आनंद त्रिपाठी ‘रत्नेश’ ने अपनी दो पुस्तकें - “स्वर्णिम भारत के स्तंभ! महापुरूषों की अमर गाथा” और “भारत की गौरव! 31 आदर्श भारतीय नारियां” गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित की। प्रथम पुस्तक में अन्य महापुरूषों के साथ-साथ आचार्यश्री महाश्रमणजी के जीवन पर भी एक विशेष अध्याय सम्मिलित किया गया है। परम पूज्य गुरुदेव ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वचन प्रदान किया।