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विलक्षण समर्पण विलक्षण समता
विलक्षण समर्पण
कुछ साधु सध्वियों का विशेष समर्पण हमारी व्यव्स्था को सुगम बना देता है। इसमें मुनि जयचंदलाल जी और साध्वी सरोजकुमारी जी का विलक्षण समर्पण हुआ। साध्वी सरोजकुमारी जी को संयुक्त सिंघाड़े के बारे में कहा तो बोली गुरूदेव। आपने बड़ी कृपा कराई। संयुक्त सिंघाड़ा क्यों? मुझे तो साध्वी केसरजी के साथ रखें तो भी मैं रहने के लिए तैयार हूं। आपकी कृपा है इसलिए आपने पूछ लिया, अन्यथा इस मामले में मुझे पूछना ही क्या? मैं तो आपके चरणों में समर्पित हूं।
प्रज्ञा पुरूष आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के श्रीमुख से नि:सृत ये अमृत वचन आपके विलक्षण समर्पण भाव के द्योतक हैं। शासनश्री साध्वीश्री सरोजकुमारी जी आचार्य त्रय की करूणा, कृपा व अनुग्रह प्राप्त करने वाली विशिष्ट संयम साधिका थी यदि मै ऐसा कहूं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वे गुरु वचनों को अपने मस्तिष्क का मुकुट मानकर प्राण प्रण से शिरोधार्य करती थी। वे कई बार फरमाते गुरू कृपा सौभागी को ही मिलती है।
विलक्षण गुणों की धनी
सूरत निवासी मुंबई प्रवासी वकीलवाला परिवार शासनश्री साध्वीश्री सरोज कुमारी जी जैसी महान आत्मा को जन्म देकर धन्य हुआ। अत्यन्त सरल स्वभाव सेवा परायण और धार्मिक अनुराग से ओत-प्रोत गुलाब चंद भाई तथा माता श्री जसकोर बहन के शुभ संसकारों ने आपकी प्रतिभा को बचपन से ही महानता की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया। वि.सं 2023 कार्तिक कृष्णा अष्टमी को तेरापंथ की राजधानी सरदारशहर में आचार्यश्री तुलसी के कर कमलों से आपको दीक्षित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तेरापंथ धर्मसंघ में आप अंग्रेजी जानने और बोलने वाली प्रथम साध्वी थी। शासन गौरव साध्वी श्री राजीमति के साथ कलकत्ता चातुर्मास करने वाली प्रथम साध्वियों में एक आप भी थे। सतरह वर्ष तक गुरूकुल वास में साधना करने का तथा दो वर्ष मातुश्री वंदना जी की उपासना व सेवा का सौभाग्य आपको प्राप्त हुआ। तत्पश्चात वि सं 2030 में आपको अग्रगामी की वंदना करवाई। आपने सुदूर प्रान्तों की यात्राएं की। जैन शासन व धर्मसंघ की खूब प्रभावना की। हैदराबाद की ओर विहार करते समय लाडनू में आपको गणाधिपति गुरूदेव श्री तुलसी ने मंगलपाठ सुनाते हुए फरमाया “थारो सिंघाडों आछो है”। एक बार प्रासंगत परम पूज्य महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने फरमाया इनका सिंघाडा धर्मसंघ में विशिष्ट सिंघाडा है। गुरूओं का ऐसा वचन, सभी अमृत गुरूओं की ऐसी कृपा भाग्यशाली को ही मिलती है। आपकी विरल विशेषताओं का मूल्यांकन करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आमेट मर्यादा महोत्सव के अवसर पर 20.1.2012 को करूणा बरसाते हुए आपको “शासनश्री” संबोधन प्रदान किया। आपका भाग्य सौभाग्य अंतिम समय तक भी वर्धमान रहा। योगक्षेम वर्ष व आचार्य तुलसी दीक्षा शताब्दी वर्ष के ऐतिहासिक अवसर पर आपने पूर्ण सजगता के साथ आचार्य प्रवर से संथारा ग्रहण कर पंडित मरण का वरण किया। जीवन के संध्या काल को भी खूब संवारा, वेदना के क्षणों में आत्मा भिन्न, शरीर भिन्न का पाठ हृदयांगन किया। अंतिम समय में जिस समरसता का परिचय दिया वह अनुकरणीय था। आपको अंतिम समय में आदरणीय मुख्य मुनि प्रवर योगक्षेम वाहिनी साध्वी प्रमुखाश्री विश्रुत विभा जी एवं सम्माननीय साध्वी वर्या श्री संबुद्धयशा जी तथा विशाल धर्मसंघ का भी अनूठा योग मिला। सचमुच आप सौभाग्यशालिनी थी।
विलक्षण संयम साधना
श्रमण जीवन निभाना दुर्लभ है और उसका परिस्थत होना अतिदुर्लभ है। साक्षी भाव से संयम साधना में रमण करते हुए आपने दुर्लभ रत्न की तरह धर्मसंघ में अपनी पहचान बनाई। आपकी आचार निष्ठा, मर्यादा निष्ठा गुरू के प्रति अनन्य समर्पण भाव सेवाभावना नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय आदरणीय है। सहजता सौम्यता और सजगता की त्रिवेणी के आत्मसात कर उन्होंने अपनी संयम साधना को शिखर चढ़ाया। निरभिमान, सरलता, निर्लिप्तता और हृदय की निर्मलता ने उनके अध्यात्म की ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। मैं अपना सौभाग्य मानती हूं कि आप की छत्रछाया में मुझे पच्चीस वर्ष साधना करने के सुअवसर मिला। आपने मुझे खूब विकास के अवसर प्रदान किया। गुरू भक्ति और संघ निष्ठा के अच्छे संस्कार दिये। आपकी शांत प्रकृति हंसमुख चेहरा, श्रम निष्ठा, कला प्रवीणता, निर्भीकता, शौर्य संपन्ता और अनुशासन निष्ठा ने मुझे बहुत प्रभावित किया। पच्चीस वर्षों में मैने कभी आपको उत्तेजना में आवेश में बोलते नहीं देखा। आप सुनते ज्यादा बोलते कम। आगम की भाषा में परिपक्वभाषी थे। आप हम सहवर्ती साध्वियों को खूब आत्मीय भाव से सुनती। स्वयं सकारात्मक चिंतन से भाषित रहती और हमें भी ऐसी प्रेरणा देते रहते। सेवा भावना व निर्जरा की भावना रहती। कई बार मैं अध्ययन कर रही होती तो आप स्वयं पानी पिला देते थे। आपका खाद्य संयम विशिष्ट था। स्वाद विजय की साधना साध्य थी। आहार में कटु कोला, अलूणा भोजन आने पर भी आप अपनी ओर से कभी अभिव्यक्ति नहीं देती थी। कभी साध्वी चन्द्रलेखा जी आदि हम साध्वियां कहती अमुक पदार्थ ऐसा था आपने हमें बताया नहीं तो आप मुस्कुराकर फरमाती “जवणटाए न तु तिहाए”। साधु का खाना संयम निर्वाह के लिए है कि स्वाद के लिए। गुजरात में कहा जाता है। माणसनी परखा स्वाहले या पहले अर्थात मनुष्य की परीक्षा या तो चारपाई में जाता है तब होती है या भोजन के पाट पर बैठता है तब पता चलता है कि वह कितनी समता रख सकता है। आपकी समता अद्भूत थी सहिष्णुता बेजोड़ थी। युद्धगलों के प्रति अनासक्ति थी। आपके चिंतन में कभी आग्रह नहीं देखा। शासन माता महाश्रमणी साध्वी प्रमुखाश्रीजी ने फरमाया मोहमयी मुंबई के भौतिक वातावरण में रहकर भी आप उससे अलिप्त रही। आप मुंबई की एक मात्र साध्वी हैं आपके जीवन में सहजता सरलता है आप मोहमयी मुंबई से होकर भी निर्मोहिता की साधना में संलग्न है। इस प्रकार उनके जीवन का हर पक्ष प्रेरणा स्रोत रहा। चिंतन का हर कोण जीवन का दर्शन देता रहा और पुरुषार्थ का हर प्रयन्त स्वयं में आत्म विश्वास जगाता रहा। वे सदैव साधना के क्षेत्र में सजग थी। सुप्त अवस्था में उनके हाथ में माला चलती रहती थी। उन्होंने संभवत: संयम जीवन में ज्यादा पुण्य क्षीण नहीं किये। क्योंकि उनकी संयम साधना उच्च कोटि की थी। एक चुल्लू पानी की अपेक्षा होती तो वे चार चुल्लू पानी व्यर्थ नहीं करते। रही प्रकार वाणी संयम, उपकरण संयम की साधना भी सधी हुई थी। उसे मुझे सदैव विनय, आचार निष्ठा व्यवहार कौशल और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरूषार्थ करने की प्रेरणा मिली।
विलक्षण कार्य शैली
अमृत पुरूष, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने वासी (नई मुंबई) मर्यादा महोत्सव के स्वर्णिम अवसर पर 17 फरवरी 2024 को मुझे अग्रगामी की वंदना करवाई। भायंदर चातुर्मास फरमाया। भायंदर चरतुर्मास से पूर्व भायंदर चौखले का स्पर्श करते हुए हम लगभग सत्रह दिन विरार रहे। विरार से विहार करने से पूर्व विरार सभा के मंत्री अजय ने कहा बहुत वर्ष पूर्व साध्वी श्री सरोजकुमारी जी ने विरार में मर्यादा महोत्सव किया और एक-एक परिवार को संभाला गोचरी करवाई उसके बाद पूरे विरार क्षेत्र को आपने सभाला है। गोचरी करवाई है। मैंने कहा हमें ये संस्कार वहीं से मिले हुए है। ज्ञानशालाा के बच्चों के निर्माण में भी वे बहुत समय लगाते। आप हैदराबाद चातुर्मास के लिए पधार रहे थे। एक दिन मार्ग में हैदरबाद से दो बसों में श्राावक श्रााविकाएं दर्शनार्थ आए बातचीत चली। कुछ लोगों ने कहा महाराज हमारे यहां दो दल हैं। चातुर्मास सफल हो जाये तब जाने। हमने देखा आप जहां भी चातुर्मास करते निष्पक्ष रहते खूब श्रम करवाते, संघीय संस्कार भरते। आपने हैदराबाद सिकन्दराबाद दो चातुर्मास किये। वे चातुर्मास संघीय प्रभावना की दृष्टि से ऐतिहासिक चातुर्मास थे। अनेक लोगों को जागृत किया, गुरू धारणाएं दी, खूब तपस्याएं हुई, अच्छे कार्यक्रम हुए। जिन्होंने पहले वह बात कही। उन्होंने ही कहा आपने सफल चातुर्मास किये है। उनकी स्मृति सभा में आदरास्पद साध्वी प्रमुखाश्री विश्रुतविभा जी ने फरमाया वो सरल थी इसलिए जो कहती वैसा हो जाता हमने कई बार ऐसा अनुभव किया यघपि इन वर्षों में उन्हें श्राावक-श्राविकाओं के नाम आदि ज्यादा याद नहीं रहते पर जो नाम जो बात जो घटना प्रसंग हम चारों साध्वियों को याद नहीं आता वो आप सहजता से बता देते। सम्माननीया साध्वी वर्या जी ने गुरू कृपा प्रसार कर उनकी उत्कृष्ट भावना को भी पूर्ण किया। इस प्रकार के कई सौभाग्यशालिनी साध्वी थी। साध्वीश्री चंद्रलेखा जी वर्षो तक उनकी अभिन्न रही।
साध्वी प्रभावनाश्री जी, साध्वी सोमप्रभाजी, साध्वी चिरागप्रभा जी ने उनकी खूब तन-मन से सेवा की। मुंबई का वकीलवाला गुजराती परिवार खूब धार्मिक परिवार है। हमारे 2024 के भायंदर चातुर्मास में उनके प्राय: सब न्यातियों ने खूब सेवा की।
तेरापंथ की राजधानी सरदारशहर में उन्होंने आचार्यश्री तुलसी के कर कमलों से संयम रत्न अंगीकार किया और तेरापंथ की वर्तमान राजधानी लाडनू योगक्षेन वर्ष व तुलसी दीक्षा शताव्दी वर्ष के ऐतिहासिक क्षणों में उन्होंने परम मूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सान्निध्य में अनशन पूर्वक समाधि मरण का वरण किया। दिवगंत आत्मा के आध्यात्मिक विकास की मंगल कामना।
आपका कर्तव्य शब्दों से बताया नहीं जाता,
आपका व्यक्तित्व वाणी से गाया नहीं जाता।
आपने जो कुछ किया वह मेरे पर अहसान नहीं,
पर आपका उपकार कभी भुलाया नही जाता।।