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अणुव्रत संयम साधिका “शासनश्री” साध्वी सरोजकुमारी जी पर उद्गार
महत्ता वृक्ष की नहीं उसके बीज की होती है, महत्ता दीपक की नहीं ज्योति की होती है भव्यता महल की नहीं उसकी बुनियाद की होती है ठीक इसी प्रकार वह व्यक्ति सबके लिए आदरणीय, आचारणीय और सम्माननीय बन जाता है। जिसके व्यक्तिव्य और कर्तृत्व ने ऊचाइयों का स्पर्ष किया है। इसी श्रृंखला में एक नाम शासनश्री साध्वी सरोजकुमारी जी मुंबई का गौरव के साथ लिया जाता है। आपकी निडरता, पापभिरूता, सहनशीलता और संस्कार देने की कला सदैव मेरी स्मृति में रहती है। मेरी दीक्षा के तीसरे दिन परम पूज्य महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने मुझे आपको वंदना करवाई। उसके बाद मेरी बड़ी दीक्षा करवाने आप और साध्वीश्री सोमप्रभाजी ने आचार्य प्रवर के साथ विहार किया और दीक्षा के सातवें दिन प्रात: मेरी बडी दीक्षा होने के बाद पुन: गंगाशहर पधार गये। आपने मुझे साधुचर्या के आचार विचार को समझााया कुछ आगमों का अध्ययन करवाया। एम. ए. की परीक्षा दिलवाई, तत्वज्ञान की भी छ: तक की परीक्षा दिलवाई। उतराध्यपन, दसवैकालिक आगम कंठस्थ कराये। इस प्रकार मेरे जीवन निर्माण में आपका आत्मीय श्रम रहा। मैने सदैव आप में मां की ममता देखी। आपका जीवन यथा नाम तथा गुणवता से युक्त था। कमल की तरह आप प्रसन्न, निष्पक्ष, निर्मल अनासात्मक रहते और सबके उतम गुणों की महक देते।
सेवाभावना
सेवा आपके जीवन का दुर्लभतम गुण था। ग्रुप में किसी साध्वी के अस्वस्थ होने पर जब तक वह ठीक नहीं होती आपको चैन नहीं मिलता। आप उसकी सेवा में लगे रहते सन 2021 सरदारशहर चातुर्मास में मुझे डेंगू हो गया। उस समय कई बार रात्रि में नीद नहीं आती। मैं उठकर आपके पास आ जाती अथवा आप स्वयं उठकर मुझे अपने बिस्तर के पास ले आते और जप, स्वाध्याय कर हाथ फेर मुझे नींद दिला देते, कभी कभी तो मेरी अस्वस्थता में आप नीचे सोते और मुझे उपर सुला देते। इस प्रकार आपमें सेवा, संस्कार बहु गहरे थे बिना ग्रुप भी किसी साध्वी की अस्वस्थता का पता चलता तो आप उसके पास पहुंच जाते। एकयूप्रेसर आदि के पोइन्ट भी दबा देते। सेवा वही व्यक्ति सुचारु रूप से कर सकता है जो स्वार्थ को छोड़ परमार्थ का अभिलाषी होता है। उतराध्ययन के 29वें अध्ययन में प्रज्ञप्त है कि वैयावृत्य से जीव तीर्थकर गोत्र का बंध करता है।
श्रम निष्ठा
आपकी श्रम निष्ठा, कर्तव्य निष्ठा और कार्य निष्ठा बेजोड़ थी। आपका जीवन स्वावलंबी था। लगभग सत्तर वर्ष की अवस्था में भी आप गोचरी पधारते, दर्शन देने पधारते। दिन में भी विश्राम कम करते कोई न कोई कार्य करते रहते। रजोहरण बनाना, मुख वस्त्रिका का निर्माण करना, पात्र रंगना आदि सब कार्मों में आप सक्रिय रहते। जब हम पानी लाने जाते तो आप मुझे कहते नयोडा किया तुम्बा लाओं, दो तुम्बा लाओ ते मैं देख ल्यू। मै आपको चलने के लिए मना करती तो आप मुझे कहते चुप रहो मैं बाहर जार खड़ी थे ऊंथे आ जाय। ऐसा कहते हुए आप स्वयं पधार जाते। मैं जब सिलाई करती तो आप फरमाते थेतो दुसरा काम करो सिलाई तो मैं ही कर देऊं। लगभग मैं आठ वर्ष आपके साथ रही। मैने विशेष सिलाई नहीं की पर आपने मेरे को सिलाई करने का प्रशिक्षण दे दिया। सिलाई करनी सिखा दी। वैसे मेरे कपडे आप साध्वी सोमप्रभा जी से भी सिलवा देते थे। आपने तथा साध्वी चन्द्रलेखा जी आदि साध्वियों ने मुझे अच्छे संस्कारर दिये।
कला प्रवीणता
आपकी जीवन शैली कलात्मक थी। आपको कुछ नया करना है ऐसा मनोभाव रहता। आप नूतन चिंतन करती रहती। कला में आपकी रूचि थी। दीक्षा लेने से पहले भी आपकी ड्राइंग में रूचि थी। आप अन्तरात्मा की प्रेरणा से प्रेरित और संचालित होकर कार्य समपदित करती। कई बार मेंने देखा साध्वियों की अक्वस्था के समय विहार करना होता तो आप मेनो प्रीह बनाती उसमें जहां चातुर्मास करने जाना है वहां के स्थान को चिहिनत कर विहार स्थान से उसका कनेकशन जो देते विहार अवस्था में नांगले लिए हुए साध्वियां उस दिशा में बढ़ रही है ऐसा चित्रित कर एक पेपर को ऐसे स्थान पर लगा देते। जहां दिन भर दृष्टि पड़ रही है। आप साध्वियों को कहते दिनभर जब इस पर दृष्टि पडे़ अनुप्रेक्षा करते रहना हम विहार कर रहे हैं। गुरूदेव द्वारा निदेर्शित स्थान पर पहुच रहे हैं। इस चलते- फिरते अनुप्रेक्षक प्रयेाग हमने देखा बहुत पेाजेटिव होता और सब काम आसानी से हो जाता। इस प्रकार आप पीसफुल एनर्जीफुल साध्वी थी। 93में वर्ष में भी सक्रिय थी स्वावलंबी थी। आपका मनोवल गजब का था वेदना को आपने खूब सम भाव से सहा। मेरे परम उपकारी रहे। गुरू चरणों में संयम जीवन के तीसरे मनोरथ को पूर्ण कर धन्यता का अनुभव किया। दिवगंत आत्मा के आध्यात्मिक विकास की मंगलकामनाएं।