गुरूवर की सन्निधि पाई, हर स्वप्न  किया साकार

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साध्वी कारूण्यप्रभा

गुरूवर की सन्निधि पाई, हर स्वप्न किया साकार

गुरूवर की सन्निधि पाई, हर स्वप्न किया साकार
रसना पर सयंम किया, संथारा सुखकार
जाणी तेरी पुण्याई, गुरू की सन्निधि पाई।।
प्रभु तुलसी की कृपा दृष्टि से संयम का उपहार मिला
सम, शम, श्रम का सिंचन पाकर, सुन्दर सुन्दर सुमन खिला।
नन्दन वन शासन पाया, गुरू महाश्रमण आधार।।
सहज सरल व्यवहार तुम्हारा सबके मन को है भाया
चेहरे पर मुस्कान मनोहर, दुबली पतली थी काया
अन्तिम इच्छित प्रभुवर से, पाया तुमने उपहार ।।
मिठी प्यारी वाणी तेरी, सबके मन को है भाती
जब आते थे पास तुम्हारे, वत्सलता तुम बरसाती
तेरे साथ रही थी कुछ दिन, पाया अपनत्व अपार।
योगश्रेम वर्ष का अवसर चार तीरथ का मेला है
नश्वर तन से तोडी, ममता मिट गया सभी झमेला है ।
भव सागर पार लगाने आए है तारण हार।।
लय- मेरे सिर पर…...