भगवान महावीर का जीवन विनय से सम्पन्न था

रचनाएं

प्रदीप छाजेड़, बोरावड़

भगवान महावीर का जीवन विनय से सम्पन्न था

जीवनी- शक्ति यानि जीवन ऊर्जा बहुत मूल्यवान है। अतः जो व्यक्ति इसे विवेकपूर्ण खर्च करता है वो निश्चित ही भगवान महावीर की तरह महान होता है। युग चिरकाल से सतत गतिमान है । पाषाण काल से आज परमाणु युग तक पहुँचकर यह आधुनिक युग महान बन गया है। इस यात्रा से यह स्पष्ट हो गया है कि चाहे कुछ भी हो, कितने ही अवरोध क्यों न हों, परिवर्तन की गति को कोई रोक नहीं सकता हैं । परिवर्तन अपरिहार्य है। सृष्टि का इतिहास बताता है कि बदलाव को कोई थाम नहीं सकता।
भगवान महावीर ने गर्भकाल में ही यह संकल्प कर लिया था की जब तक माता पिता जीवित रहेंगे तब तक मैं दीक्षा ग्रहण नहीं करुंगा क्योंकि उस समय भगवान महावीर वीतरागी नहीं थे । वह माता- पिता के स्वर्गवास के पश्चात् आपने अपने बड़े भाई से दीक्षा की अनुमति मांगी पर अनुमति नहीं मिली । वह आपने बड़े भाई की आज्ञा से दो वर्ष तक घर में रहकर ही साधना की थी । वह इससे यह ज्ञात होता हैं कि आप अपने बड़े भाई के प्रति कितने विनम्र थे । विनम्र व्यक्ति परिवार समाज में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता हैं । वर्तमान में हमको विनम्रता के अभाव में सर्वत्र अशांति दिखाईं दे रही हैं । वह घर परिवार समाज आदि में तनाव टकराव अलगाव आदि बढ़ता ही जा रहा हैं । हम भी भगवान महावीर की तरह विनम्रता को अपने जीवन में लायें जिससे घर - घर में अमन चैन आदि का वातावरण बन सके । दर्शन की सम्यक् भित्ति पर ही किसी आचार की प्रतिष्ठा होती है। वह प्रज्ञा,बुद्धि आदि की कसोटी पर ही तत्व की यथार्थ विवक्षा होती है।
भगवान महावीर ने बेले की तपस्या में दीक्षा को स्वीकार किया । वह दीक्षा के साथ आपने पांच संकल्प किए- 1, अधिकतर मौन रहेगा 2, अधिकतर ध्यान का अभ्यास 3, कर पात्र रहुंगा 4, भोजन आदि के लिए किसी का अभिवादन नहीं करुंगा 5 , अप्रतीतिकर स्थान में निवास करूंगा । वह आपने इसका बहुत दृढ़ता से पालन किया । वह सभी कष्टों को आपने सम्भाव से सहन कर केवल ज्ञान को प्राप्त किया । वह जन- जन का उद्धार कर आपने मोक्ष श्री का वरण किया। व्यक्ति के सुखी होने की परिभाषा उसके आर्थिक एवं भौतिक सुख से परिभाषित नही हो सकती, वह सिर्फ उसकी मानसिकता पर निर्भर करती है।
महलों में रहने वाला व्यक्ति नींद की गोली लेकर सोता है और खुले आकाश में सोने वाला गहरी नींद सोता है। शालीनता का एक सूत्र हैं कोई मेरा बुरा करे वह उसका कर्म हैं । मैं किसी का बुरा न करूँ यह मेरा धर्म हैं । यह कितना सुन्दर सूत्र हैं पर इतना सरल नहीं हैं । वह हम भी भगवान महावीर के जीवन से प्रेरणा लें अपनी शालीनता को ना खोयें। वह हम विनय,विवेक आदि की महत्ता को समझते हुए,अहंकार का भार ना ढोंयें।