पुरुषार्थवाद के प्रणेता : भगवान महावीर

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डा. मुनि मदन कुमार

पुरुषार्थवाद के प्रणेता : भगवान महावीर

धर्म का सार्थभीम रूप है अहिंसा। यह आत्मतुला की भावना पर प्रतिष्ठित है। प्राणी मात्र की आगतुल्य समझना और मैत्रीपूर्ण आचरण करना अहिंसा का दर्शन है। भगवान महावीर ने अहिंसा को जीया, उसे उत्कर्ष पर पहुंचाया जिससे वे अहिंसा के मूर्त रूप बन गए। केवल ज्ञान और केवल दर्शन की पाकर वे अहिंसा धर्म के उद्‌गाता बनें। उनके धर्मोपदेश से जनता-जनार्दन की दृष्टि और विज्ञा प्राप्त हुई तथा आत्मकल्याण का पथ प्रशस्त हुआ। भगवान से कहा-संग्रह दुःख और पाप का मूल है। मनुष्य पदार्थ निरपेक्ष तो नहीं बन सकता किंतु आसक्ति विहीन बन सकता है यही संपरिग्रह चेतना के विकास का मार्ग है। जीवन में जितना अपरिग्रह का भाव बढ़ेगा उतना ही दुःख विलय और पाप विरति का मनोभाव सफल हो सकेगा। निग्रॅन्ध के लिए अपरिग्रह जरूरी है और यह प्रायोगिक स्तर पर वैसा घटित कर सकता है। गृहस्थ जीवन-यापन करने वाला पूर्ण अपरिग्रही नहीं बन सकता, किंतु वह परिग्रह का सीमाकरण कर सकता है। इच्छा परिणाम और दिशा परिमाण व्रत की आराधना गृहस्थ के लिए अवश्य करणीय है। संग्रह के साथ आग्रह और विग्रह भी जुड़ा हुआ है। गृहस्थ जीवन में संग्रह नहीं छूटता किंतु आग्रह और विग्रह मुक्त जीवन जीया जा सकता है। धन जीवन का सर्वस्व नहीं है वह भगवान ने बतलाने के लिए कहा था-वित्तेग ताणं न लमे पमत्ते-धन से आण नहीं मिलता। धन न मृत्यु के समय साथ चलता है और न उससे अमरत्व की प्राप्ति होती है। धन पारलौकिक त्राण देने में समर्थ नहीं है। ऐहलोक्कि त्राण भी सर्वथा संभव नहीं है। इससे धन की असारता सिद्ध होती है। धनी व्यक्ति भी रोग और जरावस्था से कहाँ बच पाते हैं? धन सुखावह कम और दुःखावह अधिक बनता है। धन से बहुलतया आसक्ति पैदा होती है और उससे मन, भय, चिंता और तनाव का अनुभव करता हुआ उद्वेलित बना रहता है। आसक्ति परिग्रह है। जहाँ परिग्रह है वहीं हिंसा और आत्म पतन अवश्यंभावी है। अतः परिग्रह की न्यूनता में हिंसा की न्यूनता का साक्षात्कार किया जा सकता है।
भगवान महावीर पुरुषार्थवाद के प्रणेता हैं। पुरुषार्थ का अर्थ है-निवृति ओर शोधन की दिशा में प्रस्थान। हिंसा, असत्य, स्तेय, मैथुन और परिग्रह से विरत होना निवृत्ति है तथा ध्यान, स्वाध्याय आदि आध्यात्मिक अनुष्ठान में प्रवृत्त होना बोधन है। यह पुरुषार्थ आत्मोदय का राजमार्ग है। संसारी जीव कर्मबद्ध है और उन कभी के उदय से नए कर्मों का संचय करते रहते है। यह अनादिकालीन कर्म व्यवस्था है। इसमें परिवर्तन संभव है। इसका हेतु है-संवर और निर्जरा की साधना अर्थात् निवृत्ति और शोधन की दिशा में प्रस्थान। जब नए आने वाले कर्मों का निरोध किया जाता है और पूर्व संचित कर्मों का क्षय किया जाता है तब जीव सर्वथा कर्म मुक्त बन जाता है। इस प्रक्रिया से अनादिकालीन कर्म व्यवस्था विघटित हो जाती है। कर्म बलवान होते हैं किंतु पुरुषार्थ के द्वारा उन्हें निष्प्रभावी किया जा सकता है। यह सच्चाई है कि जो पुरुषार्थ नहीं करता उस पर कर्म हावी हो जाते हैं। जीव बलवान है या कर्म? इस प्रश्न को सापेक्ष दृष्टि से ही उत्तरित किया जा सकता सबसे बड़ी देन है-ज्ञाता की चीज। आत्मा के अस्तित्व को जानना और उसके प्रति आस्थावान होना सबसे बड़ी उपलब्धि है। आत्मानंदी बनने का यही मार्ग है। जरूरी है आत्मा के प्रति आकर्षण जागे, परिणामस्वरूप पुद्गल के प्रति आकर्षण घटेगा। यह है सत्य की दिशा में प्रस्थान। वर्तमान परिवेश में भीतर का आकर्षण कम हो रहा है इसलिए जीवन में विसंगतियों पैदा हो रही है। तनाव, अशांति और नशे की वृद्धि देवल बाह्य आकर्षण की निष्पत्तियों हैं। बहिर्मुखता के कारण आनंद के स्थान पर आतंक जाग रहा है। भगवान महावीर ने कहा स्वयं सत्य की खोज करो। जब सत्य की दिशा में प्रयाण होगा तब आकर्षण की दिशा स्वतः बदल जाएगी। भगवान से पूछा गया-धर्म का निवास कहीं है? उन्होंने कहा-जहां सरलता, शुद्धि और पवित्रता है, वहीं धर्म का निवास है। धर्म क्रियाकांड में नहीं, वितरागता की साधना में है। जहाँ सम्यक ज्ञान, दर्शन और चारित्र की आराधना है यहाँ धर्म है।
महावीर का यह विश्व चिंतन सांप्रदायिक अभिनिवेश के लिए स्पष्ट चुनौती है। आचार्य महाप्रज के शब्दों में भगवान महावीर के विचारों को विश्वव्यापी बनाया जाए तो महावीर को सर्वश्रेष्ठ विचारक के रूप में प्रस्तुत और प्रतिष्ठित किया जा सकता है। निःशस्त्रीकरण के प्रथम प्रवक्ता भगवान महावीर है। असंयम को भाव शस्त्र बतलाकर उन्होंने अंतःकरण के निःशस्त्रीकरण पर बल दिया था। आज विश्वमें हिंसा, आतंक और युद्ध की समस्या विकट रूप में खड़ी है। निःशस्त्रीकरण की चर्चा भी चलती है किंतु जब तक असंयम की समस्या का समाधान नहीं होगा तब तक विश्व समुदाय समस्यामुक्त नहीं बन सकेगा। भगवान ने विश्व मानव को मैत्री का संदेश दिया।