रचनाएं
कर्मों की बेड़ियां टूट जाएगी, आत्मा बनेगी विशुद्ध
बोलो सदा तोल मोल कर, करो मधुर संवाद,
मौन रखना सीखो महावीर से, मत करो कभी विवाद।
कहते हैं महाप्रज्ञ गुरुवर, जीवन में कुछ पाना है तो,
क्षण-क्षण का उपयोग कर लो, मत करो कमी प्रमाद।।
ग्वाला मारने दौड़ा, पर महावीर नहीं हुए क्रुद्ध
लीन हो गए साधना में कर्मों से कर लिया युध्द।
कहते हैं महाप्रज्ञ गुरुवर, समता में रहना सीख लो,
कर्मों की बेड़ियाँ टूट जाएगी, आत्मा बनेगी विशुद्ध॥
कठोर साधना कर महावीर ने, पाया केवलज्ञान।
चंदना से भिक्षा ग्रहण कर, बढ़ाया नारी का सम्मान।।
कहते हैं महाप्रज्ञ गुरुवर, अनुपम थी महावीर की करुणा,
स्वयं पीकर कष्टों का हलाहल, कराया अमृत का रसपान॥
भौतिक सुखों की लालसा का, नहीं आता कभी अन्त,
तृप्त नहीं होगा मन कभी, चाहें भोगो जीवन पर्यंत।
कहते हैं महाप्रज्ञ गुरुवर, भोगों को नहीं अब स्वयं को जानो-
जो जान लेता है स्वयंको, वह हो जाता है अनन्त॥
जाति-पांति का भेद मिटाया, तोड़ दी ऊँच-नीच की दीवार,
सदियों की रुढ परंपराओं पर, किया निर्मम प्रहार।
कहते हैं महाप्रज्ञ गुरुवर, मानव-मानव के मित्र थे महावीर
गुलामी और दासप्रथा मिटाकर, बन गए क्रान्ति के सूत्रधार॥
अहिंसा के अग्रदूत थे महावीर, उनका दर्शन था बड़ा क्रान्त,
उनके मृदु स्वर को सुनकर, चंडकौशिक भी हो गया शान्त।
कहते हैं महाप्रज्ञ गुरुवर, जन-जन के पथदर्शक बन गए महावीर,
क्योंकि करुणा उनके हृदय में थी, और विचारों में था अनेकान्त॥