धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

'किं तत्तं'– तत्त्व क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में  भगवान महावीर ने कहा-जो उत्पन्न होता है, नष्ट होता है और स्थिर रहता है वह तत्त्व है, अस्तित्व है। अस्तित्व-प्रतिपादन की यह त्रिपदी अनेकान्त की आधार शिला है। अस्तित्व वही है। जिसमें ध्रौव्यांश भी हो और पर्यायांश भी। पदार्थ का पर्याय-पक्ष अनित्य है। उसका ध्रौव्य-पक्ष नित्य है। उदाहरणार्थ-जीव एक द्रव्य है। वह कभी मनुष्य बनता है, कभी पशु, यह उसका पर्याय-पक्ष है। यह अनित्य है। जीव का असंख्य- प्रदेशात्मक पिण्ड, जो आत्मा है, उसका ध्रौव्य पक्ष है। वह नित्य है। यशोविलास में त्रिपदी का जिक्र इस प्रकार पद्यबद्ध किया गया है–
जिण कारण पर-दरसणी, नित्यानित्यैकान्त। 
मानै, तिण रो मूल ही, त्रिपदी हरे नितान्त।। 
सकल सत्व मांही सझे निज नित्यानित्यत्व। 
यतो न विघटै संघटै, वस्तुस्वत्व अपरत्व।। 
बिन त्रिपदी सपदि-ग्रहै, वस्तु-ब्रात विरंग।
शशक-श्रृंग, बन्ध्या-तनय, गगन-कुसुम रो रंग।।
(का: ४/उल्लास प्रवेश ५-७)
4. भगवान महावीर की छद्मस्थ अवस्था का प्रमाद
मुनि को तपोबल से लब्धियां (विशेष शक्तियां) उपलब्ध हो सकती हैं। किन्तु उनका प्रयोग मुनि के लिए परिहार्य होता है। उनका प्रयोग करना मुनि का प्रमाद या-चूक मानी गई है। भगवान महावीर लब्धि- सम्पन्न साधक थे। उन्होंने अपने मुनि-जीवन के छद्मस्थ-काल में शीतल तेजोलेश्या के प्रयोग से गोशालक की रक्षा की थी। आध्यात्मिक आचार संहिता का यह अतिक्रमण था, प्रमाद था। आचार्य भिक्षु ने इस प्रसंग को पद्यबद्ध किया है-
छह लेश्या हूंती जद वीर मैं, हूंता आठूई कर्म। 
छद्मस्थ चूक्या तिण समें, मूरख थापे धर्म।।
पूज्य कालूगणी उदयपुर में विराजमान थे। एक बार कुछ तेरापंथेतर जैन आवक गुरुवर के उपपात में आए। और उन्होंने प्रश्न किया-आप भगवान महावीर को चूके बतलाते हैं, यह कैसे? पूज्य दादा गुरुदेव ने फरमाया-छद्मस्थता के कारण भगवान चूके थे। इतने में ही उन श्रावकों में से एक प्रमुख श्रावक बोला-भगवान तो गर्भावस्था से ही केवलज्ञानी थे, फिर चूके कैसे? सम्मुखीन आवक से पूछा गया- जन्म, शादी और पुत्री-उत्पत्ति के समय भी क्या भगवान केवली थे?
उसने सकारात्मक उत्तर दिया। विनोद के स्वर में गुरुवर बोले-अब तो कोई प्रश्न अवशेष रहा ही नहीं। केवलज्ञानी गर्भस्थ भी होते हैं, जन्म भी लेते हैं, शादी भी करते हैं और सन्तान भी पैदा करते हैं। हमने तो छद्मस्थ भगवान की चूक बताई है। आपने तो सर्वज्ञ  भगवान की शादी तक करवा दी। और ऐसा कहते आपको जरा संकोच भी नहीं हुआ। बिना किसी उत्तर-प्रत्युत्तर, प्रश्नकर्ता दल ने अपना रास्ता ले लिया। इस प्रसंग को कालूयशोविलास में इस प्रकार गुम्फित किया गया है।
एक दिवस कइयक प्रतिपक्षी, श्रावक हिलमिल आया जी। 
धार्मिक-चर्चा प्रश्न-पडुत्तर उत्तर लेण उम्हाया जी।।
पूछै प्रश्न प्रसन्नमना, थे चूक्या वीर बतावो जी। 
ते किण लेखे? सुगुरू विशेखे छउमथता रो दावो जी।।
सब में अग्रगण्य इक बौले, प्रभु तो पंचम-नाणीजी। 
गर्भ-छतांपिण हूंता साहिब! तब कुण चूक निशाणीजी?।। 
जद जनम्या, जद परण्या भगवान तब ही केवलधारी जी?।
पुत्री एक हुई तब ही? पूंछतां शीघ्र स्वीकारीजी ।। 
बोले पूज्य विनोद भाव में, अब कोई प्रश्न न बाकी जी।
केवलज्ञानी गर्भ धरै अरु जनमै परणै भाखी जी।। 
सुणो सयाणां ! छद्मस्थां री, म्है तो चूक बताई जी। 
केवलियां नै परणावत नहिं थानें शंका आई जी।।
बिन बोले सहु होले होले, निज-निज सेरी संभी जी।
देष-भाव स्यूं निंदात्मक परचेबाजी प्रारम्भी जी।।
       (का. २/६/२१-२७)