श्रमण महावीर

स्वाध्याय

आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

भगवान ने श्रमण-श्रमणियों को आमंत्रित कर कहा- 'आर्यों! कामदेव गृहवासी है, फिर भी इसने अपूर्व जागरूकता का परिचय दिया है, दैविक उपसर्गों को अपूर्व समता से सहा है। इसका जीवन धन्य हो गया है। तुम मुनि हो। इसलिए तुम्हारी धर्म-जागरिका, समता, सहिष्णुता और ध्यान की अप्रकम्पता इससे अनुत्तर होनी चाहिए।'
अप्रमाद शाश्वत-प्रकाशी दीप है। उससे हजारों-हजारों दीप जल उठते हैं। हर व्यक्ति अपने भीतर में दीप है। उस पर प्रमाद का ढक्कन पड़ा है। उसे हटाने का उपाय जान लिया, वह जगमगा उठा। वह आलोक से भर गया। आलोक बाहर से नहीं आता। वह भीतर में है। बाहर से कुछ भी नहीं लेना है। हम भीतर से पूर्ण हैं। हमारी अपूर्णता बाहर में ही प्रकट हो रही है। प्रमाद का ढक्कन हट जाए, फिर भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो उठते हैं।
गौतम पृष्ठचंपा से विहार कर भगवान के पास आ रहे थे। पृष्ठचंपा के राजर्षि शाल और गागलि उनके साथ थे। भगवान के समवसरण में बैठने की व्यवस्था होती है। सब श्रोता अपनी-अपनी परिषद् में बैठते हैं। शाल और गागलि केवली-परिषद् की ओर जाने लगे। गौतम ने उन्हें उधर जाने से रोका। भगवान ने कहा-गौतम ! इन्हें मत रोको। ये केवली हो चुके हैं।
गौतम आश्चर्यचकित रह गए- 'मेरे नव-दीक्षित शिष्य केवली और मैं अकेवली । यह क्या?' गौतम उदास हो गए। प्रमाद की तमिस्रा सघन हो गई।
कुछ दिनों बाद गौतम अष्टापद की यात्रा पर गए। कोडिन्न, दिन्न और शैवाल-तीनों तापस अपने शिष्यों के साथ उस पर चढ़ रहे थे। वे गौतम से प्रभावित होकर उनके शिष्य हो गए। गौतम उन्हें साथ लेकर भगवान के पास आए। वे केवली-परिषद् में जाने लगे। गौतम ने उन्हें उधर जाने से रोका। भगवान ने कहा- 'गौतम! इन्हें मत रोको। ये केवली हो चुके हैं।''
गौतम का धैर्य विचलित हो गया। वे इस घटना का रहस्य समझ नहीं सके। बोधिदाता अकेवली और बोधि प्राप्त करनेवाला केवली। चिरदीक्षित अकेवली और नवदीक्षित केवली। यह कैसी व्यवस्था? यह कैसा क्रम? गौतम का मानस-सिन्दु विकल्प की ऊर्मियों से आलोड़ित हो गया। उनका विकल्प बोल उठा-'मैं किसे दोष दूं? मेरे भगवान ने ईश्वर को नियंता माना नहीं, फिर मैं उस पर पक्षपात का आरोप कैसे लगाऊं? मेरे भगवान भी मेरे आंतरिक परिवर्तन के नियंता नहीं हैं, इस प्रकार वे भी पक्षपात के आरोप से बच जाते हैं। अपने भाग्य का नियंता स्वयं मैं हूं। अपने प्रति पक्ष या प्रतिपक्ष का प्रश्न ही नहीं उठता। मेरे भगवान ने व्यक्ति को असीम स्वतंत्रता क्या दी है, एक अबूझ पहेली उसके सामने रख दी है। उसे सुलझाने में वह इतना उलझ जाता है कि न किसी दूसरे पर पक्षपात का आरोप लगा पाता है और न किसी से कोई याचना कर पाता है। यह मेरा अयाचक व्यक्तित्व आज मेरे लिए समस्या बन रहा है।'
'मेरे देव! हम सब एक ही सभ्यता-पथ पर चल रहे हैं। फिर मेरे शिष्यों का मार्ग इतना छोटा और मेरा मार्ग न जाने कितना लम्बा है?'
महावीर ने गौतम के मर्माहत अन्तस्तल को देखा और देखा कि उसकी मनोव्यथा पिघल-पिघलकर बाहर आ रही है। भगवान ने गौतम को सम्बोधित कर कहा- 'क्या कर रहे हो?'
'भन्ते! आत्म-विश्लेषण कर रहा हूं।'
'मेरे दर्शन में दोष देख रहे हो या अपनी गति में?'
'भन्ते! दूसरे में दोष देखने की आपकी अनुमति नहीं है, इसलिए अपनी गति का ही विश्लेषण कर रहा हूं।'
'तुम जानते हो हर व्यक्ति अज्ञान और मोह के महासागर के इस तट पर खड़ा है?
'भन्ते! जानता हूं।'
'तुमने उस तट पर जाने का संकल्प किया है, यह स्मृति में है न?'
'भन्ते! है।'
'फिर उलझन क्या है?'
'भंते ! उलझन यही है कि उस तट पर पहुंच नहीं पा रहा हूं।'
भगवान ने गौतम के पराक्रम को प्रदीप्त करते हुए कहा-
'तुम उस महासागर को बहुत पार कर चुके हो। अब तट पर आकर तुम्हारे पैर क्यों अलसा रहे हैं? त्वरा करो पार पहुंचने के लिए गौतम! पल भर भी प्रमाद मत करो।