संबोधि

स्वाध्याय

आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

ध्यानाध्ययन में आचार्य जिनभद्रगणि कहते हैं- 'मोक्ष के दो मार्ग हैं-संवर और निर्जरा। उनका मार्ग है तप और तप का प्रधान अंग है-ध्यान। इसलिए मोक्ष का मुख्य साधन ध्यान है।'
आचार्य शुभचंद्र और आचार्य हेमचंद्र एक ही स्वर में बोलते हैं-'कर्मक्षय होने से मोक्ष मिलता है और मोक्ष का साधन सम्यग् ज्ञान है। वह सम्यग् ज्ञान ध्यान के द्वारा लभ्य है। इसलिए ध्यान ही आत्मा के लिए हितकर है।
अग्नि पुराण में लिखा है-'न हि ध्यानेन सदृशं, शोधनं पापकर्मणाम्' -ध्यान के समान पापों की शुद्धि करने वाला अन्य कोई नहीं है। ध्यान संसार का उच्छेद करने वाला है। ध्यान के संबंध में बुद्ध अपने शिष्यों से कहते हैं-'शिष्यों के हितैषी शास्ता को अपने शिष्यों पर दया करके जो करना चाहिए वह मैंने कर दिया। अब भिक्षुओ! यह वृक्षों की छाया है, ये एकांत घर हैं, ध्यान करो, प्रमाद मत करो, देखो-पीछे मत पछताना, बस यही हमारा अनुशासन उपदेश है।' महावीर ने अपने शिष्यों को स्थान-स्थान पर ध्यान और कायोत्सर्ग का निर्देश दिया है।
भगवती आराधना में आचार्य लिखते हैं- 'जो साधक कषायरूपी शत्रुओं के साथ युद्ध करने में सज्ज हुआ है, उसके लिए ध्यान आयुध है। जैसे रत्नों में वज्ररत्न, सुगंधित पदार्थों में गोशीर्षचन्दन , मणियों में वैडूर्यमणि है वैसे ही साधक के लिए ध्यान है।
ज्ञानसार में कहा है- 'पत्थर में सोना और काष्ठ में अग्नि बिना प्रयोग के परिदृष्ट नहीं होती, वैसे ही ध्यान के बिना आत्मा का दर्शन नहीं होता।
ध्यान की अनिर्वायता इन तथ्यों में स्पष्ट अभिलक्षित होती है।
ध्याता– गीता में कहा है- 'हजारों मनुष्यों में से कोई एक व्यक्ति सिद्धि के लिए तत्पर होता है और उनमें भी कोई एक मुझे प्राप्त होता है। कबीर की वाणी में है-'लाखिन मध्य क्या देखे कोटिन मध्य देख।' लाखों में क्या देखता कठिन है- 'सूली ऊपर सेज पिया की।' मनुष्य का स्वभाव बहिर्मुखी है। ध्यान अंतर्मुखी है। मन, इन्द्रिय, बुद्धि, वाणी आदि का व्यवहार बाहर की ओर चलता है। भीतर इनके लिए कुछ भी नहीं है जो इन्हें तृप्त कर सके। भीतर वही जाने को उत्सुक होता है, जो इनसे तृप्त हो जाता है। वह स्व और पर जीवन के अनुभव से देख लेता है कि बाहर कुछ मिला नहीं, न मुझे मिला और न औरों को मिला है। जो सत्य एक पर घटित होता है वह अनिवार्यता घटित होता है। अनुभव के बिना उसका यथार्थ बोध नहीं होता। दुःख अतृप्ति ही लाती है। पदार्थों के साथ यह सत्य है कि वह अतृप्ति कभी शांत नहीं होती। कहते हैं-सिकन्दर जब भारत आ रहा था तो किसी ने कहा-वहां एक अमृत कुण्ड है, जिसमें अवश्य नहाकर आना। सिकन्दर को यह याद रहा। अपने अनुचरों से कहा-खोजो, उस अमृत कुण्ड को। जैसे-जैसे पता चल गया। सिकन्दर आया, स्नान करने सीढ़ियों से उतरने लगा तब एक कौवे ने कहा-सिकन्दर मत नहा। देख मैं पछता रहा हूं। सिर फोड़ रहा हूं, चाहता हूं मौत आ जाय, किन्तु आ नहीं रही है। तू भी पछतायेगा। जीवन में दुःख ही दुःख है। सिकन्दर चौंका और सोचने लगा। देखा, कौआ सत्य कह रहा है। वासना कभी तृप्त नहीं होती। वह उन्हीं पैरों वापिस आ गया।