क्या थी प्रभु महावीर की साधना

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मुनि प्रशान्त कुमार, मुनि कुमुद कुमार

क्या थी प्रभु महावीर की साधना

भारत में योग साधना की अनेक पद्ध‌तियां प्रचलित हुई हैं। भगवान महावीर की साधना उन सब में अद्‌भुत है। अपने आपको अध्यात्म साधना के लिए पूर्णतया समर्पित किया। यानी दीक्षा ग्रहण की उस समय उनकी उम्र 32 वर्ष की थी। उस युवा उम्र में उन्होंने भौतिक सांसारिक सुख का परित्याग कर दिया। सब प्रकार की मोह-माया के चक्रजाल से मुक्त बने। उन्होंने हजारों, लाखों मनुष्यों और देव देवियों की उपस्थिति में दीक्षा ग्रहण की थी। शिक्षा ग्रहण के समय उन्होंने एक संकल्प प्रगट किया। उद्‌घोषणा की कि सब्बं मे अकरगिज्जं पावकम्म आत्म विस्मृति यानी प्रमाद में ले जाने वाले पाप कर्म मेरे लिए अकरणीय है। ‘सव्व सावज्जं जोगं पच्चाखामि’ सभी प्रकार के सावद्य योग यानी पापकारी प्रवृ‌तियों का मैं प्रत्याख्यान करता हूं। प्रत्याख्यान को हम कह सकते है लक्ष्मण रेखा। किसी भी प्रकार की नेगेटिव एनर्जी के लिए रास्ता बंद कर देना।
स्व में स्थित हो जाने की साधना
भगवान महावीर हमेशा आत्मस्थ रहते थे। यही उनकी विशिष्ट साधना थी। मोह ममत्व भाव से मुक्त होना और संतृप्त आत्मभावों में रमन करना यह उनकी साधना का एक ध्येय था। संसारी प्राणियों को सबसे अधिक ममत्व आपने शरीर के प्रति होता है। बड़े बड़े साधक लोग भी दैहिक ममत्व से मुक्त नहीं हो पाते। महावीर स्वामी ने दीक्षा ग्रहण के समय ही यह संकल्प लिया था कि मैं शरीर के ममत्व का व्युत्सर्ग करता हूँ। इस शरीर पर मनुष्य, तिर्यच और देवगति के कोई भी प्राणी कैसा भी उपसर्ग करे, इससे काटे, पीटे कुछ भी करे, मैं उससे विचलित नहीं होऊंगा। मैं कोई रिएक्शन नहीं करूंगा। साढ़े बारह वर्षों के लंबे साधना काल में भी वे अपने उस संकल्प पर पूर्ण अडिग रहे। उनका साधना काल विविध प्रकार के उपसर्ग और उपद्रवों से आक्रान्त रहा। लेकिन प्रभु महावीर देव उपसर्गो से भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी चेतना को शरीर से हटाकर अपनी आत्मा में केन्द्रित कर लिया। आत्मा में ही अवस्थित रहने के कारण बाहरी समस्त उपसर्गों, व्यवधानों से वे अप्रतिहत रहे। और इसी से उनकी आत्म शक्तियां जागृत हो उठी।
अद्‌भुत था तप उनका
भगवान महावीर ने अपने साधना काल में अधिकांश समय तप में ही बिताया। लगातार छह-छह महीनों तक वे निर्जल, निराहार रहे, और ऐसे छछ-छह महीनों के तप भी अनेक बार किये। कुछ 4 हजार 166 उपवास उन्होंने किए। ऐसी जानकारी प्राप्त होती है। उनकी सारी तपस्याएं निर्जल ही रही, यानी चौविहार तपस्याएं की।
सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य
भगवान महावीर साढ़े बारह वर्षों की साधना के पश्चात उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई। आत्म साक्षात्कार हो गया। सबसे बड़ी उपलब्धि केवलज्ञान, केवल दर्शन प्राप्त हो गया। समस्त पाप कर्म नष्ट हो गए और साधना का सवोत्त्कृष्ट लक्ष्य प्राप्त हो गया।
क्या थी सिद्धि के पश्चात साधना
एक प्रश्न सामने आता है कि जब वे तीर्थकर बन गए, आत्म साधना उनकी सिद्ध हो गई। उसके पश्चात वे क्या साधना या ध्यान करते थे?। इस विषय पर जब मैं अनुप्रेक्षा करने लगा तब कुछ ऐसा समाधान प्राप्त हुआ कि प्रभु महावीर का लक्ष्य बन गया था - सर्व जीव राशि करूं शाशन रसी। यानि दुनिया के सभी जीवों को श्रेष्ठ बना दूं, तीर्थ बना दूं। वे स्वयं कृतकृत्य हो गए अब सभी को कृत-कृत्य होने को, श्रेष्ठ बनने को, जागृत कर यही उनके ध्यान का ध्येय बन गया था। ‘अणुत्तर झाणवरं झायई’ सभी जीवों के भीतर को श्रेष्ठताओं को उद्‌घाटित कर देना, उनके उज्वल संभावनाएं हैं। उन्हें साकार बना देना यह उनका ध्येय था। इसीलिए अपनी अंतिम देशना के समय देखा कि देवशर्मा श्रेष्ठ, तीर्थ बनने को लगभग तैयार है, बस थोड़ा अटकाव आ रहा है। ऐसे समय में उसे थोड़ा मोटिवेट करने की जरूरत भर है।
इसीलिए प्रभु ने अपने आखिरी सांस से कुछ ही समय पहले अपने वरिष्ठ शिष्य गणधर गौतम को भेजा कि जाओ देवशर्मा ब्राहमण को प्रतिबोद्य देओ। सबको तीर्थ बनाना उनका ध्येय था। प्रभु महावीर की महान साधना को हम सभी श्रद्धा से नमन करते हैं।