दीर्घतपस्वी महासाधक महावीर मोहनगार

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साध्वी कुमुदप्रभा

दीर्घतपस्वी महासाधक महावीर मोहनगार

अलौकिक महाज्ञानी जगा को लगते मनहार
दीर्घतपस्वी महासाधक महावीर मोहनगार।।
नील गगन से निर्मल वर्धमान हमारे
समता की अनुपम प्रतिमा प्रभु में निहारे
तप के द्वारा खोला-आत्मानुशासन द्वार।।
अगम्य अगोचर की लीला है न्यारी
अनेकांत चेतना से खिलती है क्यारी
सत्य शोध के खातिर- हर कोशिश की साकार।।
कष्टों की आंधियों से नही घबराएं
इन्द्रिय निग्रह से पोर-पोर विकसाएं
संयम शंख बजाया बहुआयामी विचार।।
“अहासुहं देवाणुप्पिया” गौतम हरसाएं
“एस धम्मे घुए निइए” बोध दिराएं
जिनवाणी देशना से, चंडकोशिक बेड़ा पार।।
मेरू से संकल्पों से जीवन बदल दिए
प्रणत पाद्पद्मो से रोग शोक मिट गए
छवि आंखों में छाए, तुम नैय्या खेवणहार।।
लय - सावन का महीना