कैसे थे महावीर?

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मुनि मुकुल कुमार

कैसे थे महावीर?

एक दिन छाया ने मनुष्य से कहा- लो देखो तुम जितने थे उतने ही रहे और मैं तुमसे कई गुणा बढ़ गई। यह सुनकर मनुष्य मुस्कुराया और बोला- सत्य और असत्य में यही तो अंतर है। सत्य जितना है-उतना ही रहता है, जबकि असत्य पल-पल में घटता-बढ़ता रहता है। इस जगत में पूजाई वे ही होते हैं जो सत्य के चरमोत्कर्ष को छू लेते हैं। भारतीय संस्कृति में ऐसे अनगिणत ऊर्जस्वल और अनुपमेय व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने सत्य को पाया, सत्य को जीया और सत्य के आख्यापन में सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे महनीय जन केवल अपने समय के लिए ही नहीं अपितु समस्त युगों के लिए प्रकाश स्तम्भ बन जाते हैं। भगवान महावीर ऐसे ही एक दिव्य व्यक्तित्व थे। उनका जीवन केवल धार्मिक साधना का उदाहरण नहीं बल्कि गहन दार्शनिक चिंतन और मानवीय मूल्यों की चरम अभि-व्यक्ति है। उन्होंने साधकों को यह सिखाया कि बाहरी जगत को जीतना उतना कठिन नहीं है जितना अपने भीतर के विकारों पर विजय पाना है। भगवान महावीर का दर्शन आत्मस्वतंत्रता, अहिंसा की पराकाष्ठा और सत्य की अनुभूति का राजमार्ग है।
जीवन और आध्यात्मिक यात्रा
इतिहास में महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर सम-कालीन माने जाते हैं किन्तु प्रभु महावीर की ख्याति और प्रभाव अद्वितीय रहा है। आज भी भारतवर्ष में करोडों लोग उनके जीवन-दर्शन से प्रभावित हैं। भगवान महावीर इक्ष्वाकु वंश एवं काश्यप गोत्रीय राजा सिद्धार्थ एवं महारानी त्रिशला के यशस्वी नंदन थे।
उनका जन्म राजगृह के क्षत्रिय कुण्ड ग्राम में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन हुआ जिसे हम महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव के रूप में समायोजित करते हैं। उनका प्रारंभिक या मूल नाम वर्धमान था। यद्यपि जैन आगमों में उनके 16 नामों का समुल्लेख प्राप्त होता है। वे इस प्रकार हैं-ज्ञातकुलोत्पन्न, विदेह विदेहदत्त, विदेह जात्य, विदेह सुकुमाल, वीर सन्मति, अतिवीर, महावीर, ज्ञातान्वय, ज्ञातपुत्र, ज्ञातनंदन, त्रिशलानंदन, सिद्धार्थ, अन्त्य-काश्यप, वर्धमान, चरम तीर्थकर, किन्तु अपनी अप्रतिम समता और अतिशय पराक्रम के कारण उनका जगत प्रसिद्ध नामकरण हुआ-महावीर।
वर्धमान थे जन्म से, बनें कर्म से वीर।
दुःखहर्ता तारण-तरण जय-जय-जय महावीर।।
तीस वर्ष की आयु में राजसुख और सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर उन्होंने सत्य की खोज के लिए संन्यास का परम पथ चुना। बारह वर्षों की दुर्धर एवं कठोरतम तपश्चर्या और साधना के उच्चतम प्रयोगों से उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। यह केवलज्ञान किसी बाहरी उपलब्धि का परिणाम नहीं था बल्कि आत्मा की गहराई में उतरकर सत्य के प्रत्यक्ष अनुभव का प्रतिफल था।
कैसे थे महावीर?
सूयगडो के अन्तर्गत वीरत्थुई में कहा गया है-
पुच्छिंसु णं समणा माहणा य, अगारिणो या परतित्थिया य।
से के इमं णितियं धम्ममाहु, अणेलिसं? साहु समिक्खयाए।।
एक बार जम्बू स्वामी आर्य सुधर्मा से प्रश्नायित हुए - आपने भगवान महावीर के साक्षात् दर्शन किए हैं। उन्हें जैसा देखा, सुना और जाना वैसा बताएं कैसे थे महावीर?
आर्य सुधर्मा ने भगवान महावीर की महत्ता को उद्‌‌भासित करते हुए कहा- समस्त जीवयोनि को जानने वाले, जगद्‌‌गुरु, जगत को आनंद देने वाले जगन्नाथ थे प्रभु महावीर।
जैसे हाथियों में ऐरावत हाथी, पशुओं में सिंह और पक्षियों में वेणुदेव गरुड प्रसिद्ध है, वैसे ही मुनियों में भगवान महावीर सुप्रसिद्ध एवं सुविख्यात है। जैसे योद्धाओं में वासुदेव श्रीकृष्ण, पुष्पों में अरविंद क्षत्रियों में चक्रवर्ती की श्रेष्ठता सर्वमान्य है वैसे ही साधनाशील पुरुषों में भगवान महावीर श्लाघनीय हैं, श्लोकनीय हैं।
जग मे परम प्रसिद्ध है, जैसे गंगा नीर।
उससे भी लाखों गुणा, निर्मल थे महावीर॥
अलौकिक अवदान
भगवान महावीर का सबसे महान योगदान अहिंसा-दर्शन है। उन्होंने कहा कि इस संसार में प्रत्येक जीव सचेतन है। हर प्राणी अपने अस्तित्व को बचाना चाहता है। इसलिए किसी भी जीव को कष्ट देना चाहे वह विचार से हो, वाणी से हो या कर्म से वास्तव में स्वयं को ही आहत करना है। उनका ‘आय तुले पयासु’ यानि आत्मतुला का सिद्धांत मानव समाज में शांति और सह अस्तित्व की चिर स्थापना करता है।
भगवान की अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा- क्रोध, ईष्या, अहंकार भी हिंसा के ही विविधरूप हैं। जब मनुष्य अपने भीतर इन नकारात्मक भावों को समाप्त कर देता है तभी वह वास्तविक भगवती अहिंसा का पालन कर सकता है।
कभी खुशियां कभी गम दे उसे तकदीर कहते हैं।
जो आंखों में समा जाए उसे तस्वीर कहते हैं।
जो हिंसा पर अहिंसा की करे शुभस्थापना जग में,
उसी अमृत पुरुष को हम सभी महावीर कहते हैं।।
उन्होंने मनुष्य के दुःखों का आत्यंतिक कारण आसक्ति का भाव माना है। जब मनुष्य वस्तुओं, संपत्ति और सम्बंधों में अत्यधिक आसक्त हो जाता है तब वह भय, चिंता और संघर्ष के चक्रवात में उलझ जाता है। आज के अतिभौतिक वादी युग में अपरिग्रह का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है– उपयोगी है, श्रेयस्कर है।
भगवान महावीर ने स्याद‌‌वाद की स्थापना की। इसका अर्थ है- सत्य को एक ही कोण से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। प्रत्येक का दृष्टिकोण सिमित होता है। इसलिए सत्य की विभिन्न दृष्टियों को जानना अत्यावश्यक है, अनिवार्य है। सच्चा ज्ञानी वही होता है जो आग्रह मुक्त होकर चिंतन के सभी पहलुओं को समझने और स्वीकार करने की क्षमता रखता है। आज के समय में विचारों की असहिष्णुता और मतभेदों के कारण संघर्ष द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ रहे हैं। वहीं महावीर का अनेकांतवाद विश्व के लिए महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है।
भगवान महावीर का सम्पूर्ण जीवन आत्म-विजय की साधना का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा- मनुष्य की सबसे बडी विजय भीतर के विकारों को जीतने में है। जब तक कषाय चतुष्क पर मानव विजय प्राप्तनहीं करता, तब तक वह सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नहीं होता। उन्होंने आत्मसंयम, ध्यान एवं साधना के माध्यम से निर्विकार होने का मार्ग सुझाया है।
उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी कार्य किये हैं। दासप्रथा का उन्मूलन इसका जीवंत प्रमाण है। उस समय जातिवाद चरम कट्टरता पर था तब महावीर ने सूत्र दिया – “णो हीणे णो अइस्ते” उन्होंने जातिवाद को अतात्त्विक माना और कहा- कोई हीन कोई विशिष्ट नहीं है। मनुष्य अपने कर्तृत्व से ही महानता को उपलब्ध होता है। यही कारण है कि उन्होंने अपने संघ में क्षत्रिय, ब्राह्मण, क्षुद्र आदि सभी वर्गों के लोगों को दीक्षित कर जातिवाद को जड़ से ही उखाड़ फेंका। उस समय के धर्माचार्य नारी जाति को दीक्षा के अयोग्य मानते थे किन्तु महावीर ने चंदनबाला आदि हजारों महिलाओं को दीक्षित कर नारी जाति को गौरवान्वित किया।
ऐसे एक नहीं अनेकों क्रान्तिकारी एवं जनोत्थान के कार्य भगवान महावीर ने किये। यही कारण है कि वे लोकमानस में बडे आदरभाव के साथ पूजे गये। महावीर जन्म कल्याणक के पुनीत अवसर पर हम महावीर की गुणोत्कीर्तना ही नहीं करें अपितु महावीर बनने की दिशा में सशक्त चरणन्यास भी करें यही अपेक्षा है।