विश्वशांति स्थापित करने का पैगाम भगवान महावीर के सिद्धान्त

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साध्वी राकेशकुमारी

विश्वशांति स्थापित करने का पैगाम भगवान महावीर के सिद्धान्त

रचा गई इतिहास जिंदगी, मौत बनी जिसका अफसाना।
कोटि नमन उस महावीर को, याद करे उसे जमाना।।
आज से ढाई हजार वर्ष पूर्वी भारत की त्याग तपोमय गौरवशाली स्वस्थ शालीन तीर्थकर परम्परा के देदीप्यमान समुज्ज्वल नक्षत्र युग चेतना के संवाहक कुण्डनपुर की पावन धरा पर क्षत्रिय कुल में महाराज सिद्धार्थ के विशाल राज-भवन में महारानी त्रिशला की पावन कुक्षी से उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र (उस समय सारे ग्रह नक्षत्र उच्च स्थान पर थे) एक दिव्य अलौकिक महान महा-पुरुष ने अवतारी के रूप में अवतार लिया। जिस समय भावी तीर्थकर का जन्म हुआ उस समय तीनों लोक आलोक से आलोकित हुए एवं क्षण भर के लिए नारकीय पर्यंत जीवों को शांति मिली। पंचदिव्य रत्नों की वर्षा हुई। देवताओं ने इन्द्रों ने भावी तीर्थकर का मेरुपर्वत पर अभिषेक कर उत्साहपूर्वक जन्मोत्सव मनाया। राजा सिद्धार्थ का आंगन खुशियों से झूम उठा। बालक के जन्म के साथ ही महाराज सिद्धार्थ के प्रांगण में धनधान्य सम्पदा वैभव की अति अभिवृद्धि होने से बालक का प्रथम नामकरण “वर्धमान” रखा गया। जन्म से ही तीन ज्ञान के धनी से सम्पन्न घटनाओं से जुड़े प्रसंगों के साथ तीनों नामों से प्रख्यात है - वर्धमान, सन्मति व महावीर। सम्पूर्ण विश्व में जैनधर्म के 24वें तीर्थकर भगवान महावीर की जन्म जयंती प्रतिवर्ष की भांति उत्साह, उल्लास, उमंग व हर्षोल्लास व धूमधाम से मनाई जा रही है। प्रभात फेरी निकाल कर भगवान महावीर के हुबहू-चित्रमय दृश्यों के साथ झांकियां का दिगदर्शन कराते हुए उपदेश संदेश फैलाया जाता है। भगवान महावीर का समग्र जीवन दर्शन समस्त प्राणी जगत का संरक्षण करने वाला आधार स्तंभ है। भगवान महावीर के सार्वभौम सिद्धान्त आज के परिवेश में समस्त प्राणी जगत के लिए अत्यंत प्रासंगिकता लिए हुए है। भगवान महावीर के जीवन का पहला सूत्र था – ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ यह दिव्य संदेश जन-जन के भीतर करुणा समता समत्व का संचार करने वाला तथा विश्वशांति करने वाला कल्याणकारी है। भगवान महावीर ने कर्मवाद अनेकांत-स्याद्‌वाद‌ का सिद्धान्त देकर सम्पूर्ण सृष्टि को उपकृत व लाभान्वित किया।
अप्पा कत्ता विकत्ताय, दुहाणय सुहाणय
अप्पा मित्तममित्तच. दुप्पट्ठीय सुपट्ठीओ- यानि अपनी आत्मा हो कर्मों का कर्ता विकर्ता अर्थात् कर्मों का उपार्जन करने वाली व तोड़ने वाली है। वो कैसे? तो कहा गया - दुष्प्रवृति में लगी हुई आत्मा शत्रु है और सत्प्रवृत्ति में लगी हुई आत्मा मित्र है। निमित्त कोई भी बन सकता है या उपादान स्वयं ही है। भगवान महावीर ने कहा- अहिंसा सव्वभूय क्षेमंकरी- हमारे जीवन में अहिंसा देवी विराजमान हो।
भगवान महावीर के तीन सिद्धान्त – अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत आज के परिवेश में समस्याओं से निजात दिलाने वाले है। विश्व की अनेकानेक समस्याओं चुनौतियां को अनेकान्त दर्शन से सुलझाया जा सकता है। जैसे - जिस समय संसद में गतिरोध हुआ था उस समय गणाधिपति पूज्य गुरुदेव तुलसी ने अनेकांत, सिद्धान्त से गतिरोध समाप्त किया था। राजीव - लोंगोवाल समझौता भी इसका विशेष उदाहरण है। तीनों सिद्धान्त पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय और समस्त विश्व के लिए विश्व शांति. स्थापित करने का पैगाम है। भगवान महावीर ने जातिवाद पर कठोर प्रहार करते हुए कहा-कम्मुणा बंमणो होई, कम्मुणा होई खत्तिओ। कम्मुणा वइसो होई सुद्दो होई कम्मुणा- मनुष्य कर्मों के आधार पर ही ब्राह्मण, क्षैत्रिय, वैश्य और क्षुद्र होता है। रंग लिंग वेश भाषा सम्प्रदाय मत पथ का मूल्य होता है। जाति बड़ी नहीं आचार सद्‌व्यवहार बढ़ा होता है। जिंद‌गी में सत्संकार धरोहर होते है। भगवान महावीर ने साफ शब्दों में कहा-धर्म के क्षेत्र में जाति वर्ण-लिंग आदि से सम्बद्ध किसी प्रकार के भेदभाव को स्थान नहीं है। मोक्ष प्राप्त करने का अधिकार जितना पुरुष को है उतना ही एक महिला को भी है। बेचाती राजकन्या चन्दनबाला को जैन शासन में दीक्षित कर 36 हजार साध्वियों का कुशल नेतृत्व सौंप साध्वी प्रमुखा पद पर सुशोभित कर करुणा के सागर भगवान महावीर ने महिला समाज का उत्थान उद्धार करते हुए सामाजिक बुराईयां का उन्मूलन कर दास प्रथा का मूलोच्छंद किया। आइए! हम समी भगवान महावीर की माने ही नहीं, बल्कि ‌अपने जीवन में उतार कर आत्म लब्धि को प्राप्त करें।