समता के प्रतिरूप : भगवान महावीर

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साध्वी पीयूषप्रभा

समता के प्रतिरूप : भगवान महावीर

'समया धम्ममुदाहरे मुणी
समता ही धर्म है। भगवान महावीर जीवन दर्शन के इस महान सत्य के केवल उपदेष्टा ही नहीं थे किन्तु जीवन व्यवहार में प्रयोक्ता भी थे। त्रिशला माता के राजदुलार और सिद्धार्थ कुल के उजियारे महावीर ने पूर्ण यौवन में राजकीय समस्त सुविधाओं का त्याग कर एकाकी साधना के पथ पर चरण न्यास किया। आत्मोपलब्धि के महान लक्ष्य को रखकर साधना में अपने आप को समर्पित कर दिया। आत्मा से परमात्मा बनने के संकल्प की पूर्णता मे समागत विविध कष्टों को सहन करते रहे।
लगगग साठे बारह वर्ष का उनका साधना काल रहा। इस अवधि में ग्वाले ने कानों में कीले ठोकी,पैरों पर खीर पकाई भयंकर वेदना में भी उनका मानस किंचित भी आन्दोलित नहीं हुआ। पूर्वकृत कर्मों की निर्जरा का लक्ष्य उनके सामने था। ध्यान और कायोत्सर्ग - ये दो उनकी साधना थी। मिनटों नहीं घंटो नहीं अपितु पूरी रात खड़े खडे भयप्रद स्थानों में उनकी अभय और मैत्री की धारा प्रवहमान रहती। चण्डकौशिक सर्प ने महावीर के शरीर में डंक लगाये लेकिन महावीर अविचल खड़े रहे ध्यान मुद्रा में,न राग न द्वेष-समता से उपसर्ग को सहन किया। उपसर्ग को सहन ही नहीं किया अपितु उसको पूर्वजन्म की स्मृति करवाकर उसका उद्धार भी कर दिया।
संगम देव ने एक रात्रि में बीस मारणान्तिक कष्ट दिए पर महावीर समता के सागर में गोते लगाते रहे। श्रीमद जयाचार्य महावीर स्तुति में लिखा है -
'संगम दुख दिया आकरा पिण सुप्रसन्न नजर द‌याल।
जग उद्धार हुवे मो थकी रे ऐ डूबै इणकाल, नही इसो दूसरो जगवीर।।
शत्रु के प्रति भी मित्रता का भाव उसके कल्याण की कामना। उनका चिंतन था कि संगम मुझे निमित्त बनाकर अपना पतन कर रहा है। यह सोच उनकी समता की पराकाष्ठा को व्यक्त कर रही है। कर्मों की सघन कारा को काटने के लिए समागत कष्टों को ही सहन नहीं किया अपितु कष्टो को आमंत्रित किया। साधु जीवन की चर्चा से अनजान अनार्य प्रदेशों में भी महावीर ने विचरण किया। कोई गालियों की बौछारे करते, बच्चे कुत्तों को पीछे लगा देते। आहार-पानी की सुलभता नहीं पर महावीर समता से स्थितियों को सहते।
इसी प्रकार प्रतिकूल परिस्थिति में संतुलित रहे। समता की छेनी को हाथ में लेकर कर्म कारा को तोड़ डाला और तीर्थकर महावीर बन गए। भगवान महावीर का जीवन आज के विषमतावादी युग में प्रत्येक व्यक्ति को समता का संदेश दे रहा है। इसीलिए आज भी महावीर प्रासंगिक है। उनका जीवन प्रेरणा पुंज है। महावीर जयंती के अवसर पर जैन धर्म के 24वें तीर्थकर प्रभु महावीर के चरणों में सादर वंदन, वंदन, अभिनंदन।