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शिखर पुरुष : भगवान महावीर
इस अवसर्पिणी काल के परम तीर्थकर भगवान महावीर आध्यात्म के शिखर पुरुष थे। उन्होंने अपनी अप्रतिम विशेषताओं से तत्कालीन जन मानस को प्रभावित किया। ढ़ाई हजार वर्षों के बाद भी उनका संदेश इस भूमंडल के मानव को नई राह दिखा रहा है। उनका जन्म चैत्र शुक्ला त्रयोदशी मध्यरात्रि में वैशाली गणराज्य के राजा सिद्धार्थ के आंगन में महारानी त्रिशला की कुक्षि से हुआ। वे जन्म से तीन ज्ञान (मति, श्रुत, अवधि) के धारक थे। वे जन्म से ही ज्ञान मतिश्रुत अवधि के धारक थे। वे जन्म से ही अनंत बली व अदभूत पराक्रम के धारक थे। उनके पराक्रमशीलता ने उन्हे हमेशा शिखर पर बनाये रखा।
जब इन्द्र ने मेरूपर्वत पर जन्माभिषेक के लिए नवजात शिशु को अभिषेक शिला पर आरूढ़ करवाया। इंद्र शिशु की छोटी काया देख सशंकित हो उठा कि शिशु अभिषेक की जल धारा को कैसे झेल पाएंगे। तब उस नवजात शिशु ने इंद्र की शंका का निवारण करने के लिए अपने अंगूठे से मेरू पर्वत को दबाया और मेरूपर्वत कंपायमान हो उठा। जब इंद्र ने अपने ज्ञान से शिशु के आनंत बल व पराक्रम को देखा तो उनकी शंका दूर हो गई और शिशु से क्षमाचाना कर हर्षोल्लास से प्रभु का जन्मोत्सव मनाया। प्रभु महावीर करूणा के शिखर पुरूष थें उनकी चेतना का कण कण करुणा से आप्लावित था। वे जब गर्भ में थे तब उन्होने मॉं को कष्ट न हो इसलिए हलन चलन बन्द कर दिया। किंतु इससे माता त्रिशला की तकलीफ और अधिक बढ़ गईं तब शिशु रूप् प्रभु महावीर ने गर्भावस्था में ही माता पिता की विद्यमानता में दीक्षा नहीं लेने का संकल्प ग्रहण किया। और अपना हलन चलन प्रारंभ कर दिया।
उनकी करूणा बूंद की तरह नहीं सागर की तरह विशाल व गहराई लिए हुई थी। यह उनकी करूणा दी थी कि उन्होने भव्य जीवों के कल्याण के लिए तीर्थ की स्थापना की और उन्होने संबोध प्रदान किया। प्राणी मात्र के दुख को अपने दुख के समान समझा। उन्होने स्वयं सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया। चंडकौशिक, अर्जुनमाली मेघुकमार आदि को संबोध प्रदान कर उन्हें कल्याण के पथ पर अग्रसर किया। वे इसलिए करुणा के अजस्र प्रवाह थे। उनकी करुणा अहिंसा से आप्लावित थी। इसलिए उन्होने षडजीवनिकाय के प्रति संयम बरतने की बात कही। जब महावीर आठवे वर्ष में चल रहे थे। एक बार बच्चों के साथ आमलकी नामक खेल खेल रहे थे। इस खेल के दौरान जैसे ही कुमार वर्धमान पेड़ पर चढें। एक सांप भी पेड़ के तने पर लिपट गया। सभी बच्चे डर के भाग गए। कुमार वर्धमान अभय थे वे पेड़ से नीचे उतरे और साप को पकड़ कर एक और डाल दिया। उनके साहस व पराक्रम को देख सभी विस्मित रह गए।
उनके पराक्रम की कहानी यहीं पर पूरी नहीं होती अपितु साधना पथ स्वीकार करने के साथ ही वे विस्तृत होती चली जाती हैं दीक्षा के दूसरे दिन ही ग्वाले के उपसर्ग को देख नंदी वर्धन ने प्रभु से निवेदन किया। भगवन साधना के दौरान अनेक उपसर्ग हो सकते हैं उसके निवारण के लिए मै सुरक्षा व्यवस्था करना चाहता हूं।
प्रभु महावीर ने कहा- साधना स्वावलंबन व स्वतंत्रता का प्रतीक है वह बाहय सहयोग, सुरक्षा परावलंबी परतंत्र बनकर नहीं की जा सकती। प्रभु महावीर का साधना के लिए स्वावलंबन व स्वतंत्रता के साथ प्रस्थान उनके अतुल पराक्रम का संकेत कर रही थी। उनके सम्पूर्ण साधना काल में मानवकृत, देवकृत और तिर्यन्चकृत उपसर्गों की श्रृखला चलती रही किंतु उनके पराक्रम की आभा नित नयी होकर निखरती गई और वे पराक्रम के शिखर पर पुरूष के रूप में जनमानस में स्थापित होते रहे। उन्होंने केवल्य प्राप्ति एवं तीर्थ स्थापना के पश्चात मानव समाज में व्याप्त जातिवाद, दास प्रथा, रानी उत्पीड़न धर्म के नाम पर हिंसा आदि मिथ्या अवधारणओं के रूप में भगवती सूत्र केशी गौतम संवाद के रूप में उतराध्ययन सूत्र की गरिमा को शतगुणित कर रहे हैं। उनके ज्ञान से निसृत अहिंसा, अनेकांत व अपरिग्रह की सिद्धांतत्रयी विश्वशांति का पथ प्रशस्त कर रही है। वे आत्म कर्तृत्व वाद, समतावाद, पुरुषार्थवाद के पुरस्कर्ता थे। वे सहअस्तित्व, सापेक्षता, मैत्री, अभय, सहिष्णुता के प्रयोगकर्ता थे। उनके बताये मार्ग पर अमल किया जाये तो विश्व युद्ध की विभीषिका से बचकर शांति व विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है। महावीर जयंती प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी सभी से आहवान करती है कि उनकी शिक्षाओं पर अमल करके जीवन में अभिनव क्रांति घटित करें। शिखर प्रभु महावीर को महावीर जयन्ती के पुनीत अवसर पर हृदय सिंहासन पर आसीन करे और गुरुदेव तुलसी के गीत की ये पंक्तियां गुनगुनाते हुए तत्व चिंतन करे। प्रभो! तुम्हारे पावन पथ पर जीवन अर्पण है सारा। बढ़े चलें “हम रूके ने क्षण भी हो यह दुढ़ संकल्प हमारा”।