अर्हत् संस्कृति के उज्जवल नक्षत्र भगवान महावीर

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मुनि चैतन्य कुमार ‘अमन’

अर्हत् संस्कृति के उज्जवल नक्षत्र भगवान महावीर

भारतीय संस्कृति सुविचार को, सुचिन्तकों और आत्मज्ञानियों की विराट संस्कृति है। वसुधैव कुटुम्बकम् का सिंहनाद करने वाली भारतीय संस्कृति को मानव संस्कृति अथवा सनातन संस्कृति कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं लगती। यह संस्कृति संकिर्णताओं से परे हटकर विशाल क्षितिज पर आरोहण कर समग्र विश्व के लिए मार्ग दर्शन है। श्री राम, कृष्ण, बुद्ध महावीर जैसे अवतारी पुरूषों ने जन्म लेकर जन मानस को धर्म और अध्यात्म का पथ दर्शन दिया है। भारतीय संस्कृति अनादि-अनंत है। सार्वभौम और सार्वजनीन है। सम्यग् ज्ञान-दर्शन-चारित्र की पावन त्रिवेणी है। भारतीय संस्कृति के मूलतत्त्व है- साधना, समन्वय, सहृदयता, सहिष्णुता, श्रमशीलता, सेवाभावना। इसीलिए इस संस्कृति को कल्पवृक्ष, चिन्तामणि रत्न और कामधेनु जैसी उपमाओं से उपमित किया गया है। विश्व की तमाम संस्कृतियों को अपनी प्राणदायी ऊर्जा से सदैव नव जीवन प्रदान किया है।
अर्हत् संस्कृति के उज्ज्वल नक्षत्र भगवान महावीर ने चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन महाराजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला की कुक्षि से शुभ नक्षत्र व शुभअध्यवसाय के साथ जन्म लिया। न केवल मानवों ने बल्कि देवताओं ने उनके जन्मोत्सव पर अभिषेक किया। क्योंकि जन्म तो उन्होंने एक साधारण मानव के रूप में लिया किन्तु तीर्थंकर जैसी महान् आत्मा के रूप में उनका अवतरण था। समय के साथ बाल्यावस्था को पार कर युवावस्था में प्रवेश किया। आत्मकल्याण की भावनाओं से प्रेरित होकर इन्द्र आदि देवों से प्रतिबोध प्राप्त कर सामान्य गृहस्थ जीवन को त्याग कर सन्यास मार्ग पर प्रस्थान कर दिया। साढ़े बारह वर्ष की घोर तपश्चर्या व ध्यान साधना से कैवल्य सूर्य का प्रकटीकरण हुआ। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद चार तीर्थ साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका की स्थापना करके तीर्थंकर बने। जनता जनार्दन के लिए धर्मोपदेश किया। अहिंसा-अनेकान्त, अपरिग्रह जैसे महान् सिद्धान्त दिए। इनकी उस आत्म कल्याणी वाणी को सुनकर कितने-कितने भव्य प्राणियों ने आत्म कल्याण के मार्ग का अनुसरण किया। किन्तु आज विश्व मानव जिस दौर से गुजर रहा है। वह नितान्त महाविनाश की ओर ले जाने वाला है। आज जरूरत है महावीर के महावचनों को आत्मसात् करके सही दिशा में गतिमान होने की। आध्यात्मिक और वैज्ञानिक इन दो पहियों पर गतिशील भारतीय संस्कृति को उन्नति के पथ पर गतिशील होने के लिए महावीर के महावचनों का अनुसरण करना होगा। पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण के चलते भारतीय तथा विश्व मानव ने इस अक्षुण्ण संस्कृति का विनाश किया है, कर रहा है जिसका खामियाजा भी भुगत रहा है। समय रहते अब भी यदि बदलाव नहीं होगा तो वह दिन दूर नहीं होगा जब पूरा विश्व हिंसा की ज्वाला में जलकर भस्मीभूत हो जाएगा। वर्तमान समय महावीर के महान् प्रतिनिधि आचार्य श्री महाश्रमणजी आदि अनेक धर्माचार्य धर्म और आध्यात्मिक प्रवचनों के द्वारा अपनी वाणी को मुखरित कर जन जीवन का सम्यग् मार्गदर्शन कर रहे है। उनकी वाणी का अनुसरण कर विश्व को महाविनाश से बचाया जा सकेगा। भगवान महावीर के जन्म कल्याणक तथा आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा आयोजित योगक्षेम वर्ष पर उनकी पावन सन्निधि में सैकड़ों साधु-साध्वियां तथा हजारों की तादाद में श्रावक और श्राविकाएं तेरापंथ की राजधानी लाडनूं (नागौर) में योगक्षेम वर्ष में ज्ञान ध्यान साधना का अनुसरण कर महावीर के महापथ पर अग्रसर है। महावीर जन्म कल्याणक मानव-मानव के कल्याण का हेतु भूत बनेगा। ऐसी भावना है।